NCERT किताब पर सुप्रीम कोर्ट का बैन: न्यायपालिका अध्याय हटाया

NCERT की कक्षा 8 की किताब पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन: न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले अध्याय पर पूर्ण प्रतिबंध

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मामलों से जुड़ी सामग्री पर कड़ा रुख अपनाते हुए उस अध्याय पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। अदालत ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला बताया और सभी भौतिक व डिजिटल प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया है। साथ ही, एनसीईआरटी अधिकारियों से जवाब भी मांगा गया है। इस पूरे घटनाक्रम के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

NCERT किताब पर सुप्रीम कोर्ट का बैन: न्यायपालिका अध्याय हटाया
NCERT किताब पर सुप्रीम कोर्ट का बैन: न्यायपालिका अध्याय हटाया — AI Generate Image

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  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त फैसला: अदालत ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक "Exploring Society: India and Beyond" के विवादित अध्याय पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
  • न्यायपालिका की छवि को नुकसान की आशंका: कोर्ट ने कहा कि इस सामग्री से न्यायपालिका की विश्वसनीयता और गरिमा को नुकसान पहुंच सकता है और छात्रों के मन में गलत धारणा बन सकती है।
  • प्रतियों को जब्त करने का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने किताब की सभी भौतिक और डिजिटल प्रतियों को जब्त करने और इंटरनेट से हटाने का निर्देश दिया है।
  • जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू: एनसीईआरटी निदेशक और शिक्षा अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया है और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और विवाद की शुरुआत

यह मामला तब सामने आया जब मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और मामलों के लंबित रहने की समस्या को प्रमुख चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस रिपोर्ट के बाद वरिष्ठ वकीलों द्वारा चिंता जताई गई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 25 फरवरी 2026 को स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस सामग्री को गंभीरता से लेते हुए कहा कि इस तरह की जानकारी न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा को कमजोर कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता लोकतंत्र की नींव है और इसे नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी कदम को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

अदालत की मुख्य आपत्तियाँ और टिप्पणियाँ

  • संस्थान को कमजोर करने का प्रयास: अदालत ने कहा कि यह सामग्री न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होती है।
  • छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव की चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की सामग्री छात्रों के मन में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है।
  • आपराधिक अवमानना की संभावना: अदालत ने संकेत दिया कि यह मामला आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आ सकता है।
  • संतुलित दृष्टिकोण का अभाव: अध्याय में न्यायपालिका की सकारात्मक भूमिका और लोकतंत्र को मजबूत करने में उसके योगदान का उल्लेख नहीं किया गया था।

विवादित अध्याय में क्या लिखा था?

एनसीईआरटी की किताब के इस अध्याय में न्यायपालिका के सामने आने वाली कई चुनौतियों का उल्लेख किया गया था। इसमें भ्रष्टाचार, मामलों की लंबित संख्या, न्यायाधीशों की कमी और अदालतों के बुनियादी ढांचे की समस्याओं को विस्तार से बताया गया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस तरह की जानकारी को प्रस्तुत करते समय संतुलन और संदर्भ का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि छात्रों को सही और पूर्ण जानकारी मिल सके।

"न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण नींव है, इसे कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

— सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में तत्काल प्रभाव से कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं, जिनका उद्देश्य विवादित सामग्री को पूरी तरह हटाना और जिम्मेदारी तय करना है।

श्रेणी निर्देश
प्रकाशन प्रतिबंध विवादित अध्याय के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया।
प्रतियों की जब्ती स्कूलों, दुकानों और संस्थानों से किताब की सभी प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया गया।
डिजिटल हटाने के निर्देश इंटरनेट और सोशल मीडिया से किताब की डिजिटल कॉपी हटाने का निर्देश दिया गया।
जवाबदेही तय करना एनसीईआरटी अधिकारियों को जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।

सरकार और NCERT की प्रतिक्रिया

इस मामले में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने बिना शर्त माफी मांगी और आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी। सरकार ने कहा कि विवादित अध्याय को हटाया जाएगा और उसे दोबारा लिखा जाएगा।

एनसीईआरटी ने भी बाद में एक बयान जारी कर स्वीकार किया कि यह एक निर्णय की त्रुटि थी और सामग्री अनुचित थी। परिषद ने भरोसा दिलाया कि भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की समीक्षा और अधिक सावधानी से की जाएगी।

शिक्षा प्रणाली और न्यायपालिका पर प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर शिक्षा प्रणाली पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है। अब भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को प्रकाशित करने से पहले अधिक सावधानी बरती जाएगी।

इस फैसले से यह भी स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता सर्वोपरि है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि छात्रों को संतुलित और जिम्मेदार जानकारी मिले।

  • शिक्षा प्रणाली में सुधार: पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की समीक्षा प्रक्रिया और मजबूत होगी।
  • संस्थागत जवाबदेही: सरकारी संस्थानों की जिम्मेदारी और जवाबदेही बढ़ेगी।
  • छात्रों पर सकारात्मक प्रभाव: छात्रों के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास बना रहेगा।
  • भविष्य में सख्त निगरानी: शिक्षा सामग्री की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।

मामले की टाइमलाइन

तारीख घटना
फरवरी 2026 मीडिया रिपोर्ट में विवादित सामग्री का खुलासा हुआ।
25 फरवरी 2026 सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और सुनवाई शुरू की।
25 फरवरी 2026 विवादित अध्याय पर प्रतिबंध और प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया गया।
11 मार्च 2026 मामले की अगली सुनवाई निर्धारित की गई है।

निष्कर्ष: शिक्षा और न्याय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला शिक्षा प्रणाली और न्यायपालिका दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस कदम से यह स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

इस फैसले से भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की गुणवत्ता और समीक्षा प्रक्रिया को और मजबूत किया जाएगा। साथ ही, यह मामला संस्थागत जवाबदेही और शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

क्या आपको लगता है कि पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की समीक्षा के लिए और सख्त नियम होने चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।

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