धुरंधर 2 (Dhurandhar: The Revenge) बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और रिव्यू: क्या यह ब्लॉकबस्टर है या सिर्फ प्रोपेगेंडा? पूरी सच्चाई!
रणवीर सिंह की 'धुरंधर 2' ने रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर 150 करोड़ की ओपनिंग के साथ सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं, लेकिन इसकी कहानी को लेकर देश में एक बड़ी बहस छिड़ गई है।
आइए विस्तार से जानते हैं फिल्म की छप्परफाड़ कमाई, कलाकारों की शानदार एक्टिंग, और उस बड़े विवाद के बारे में जिसने दर्शकों और आलोचकों को दो हिस्सों में बांट दिया है।
सुनामी बनकर आई 'धुरंधर 2': एक नई शुरुआत या सिर्फ हंगामा?
दोस्तों, 'धुरंधर: द रिवेंज' (Dhurandhar: The Revenge) अब सिर्फ एक फिल्म का नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह साल 2026 में भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज होने वाला एक ऐसा तूफान बन गया है, जिसने फिल्म बनाने के पुराने सभी तौर-तरीकों और दर्शकों की सोच को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। आपने कई हिट फ़िल्में देखी होंगी, लेकिन जो माहौल इस फिल्म को लेकर सिनेमाघरों के बाहर और सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहा है, वह सच में हैरान कर देने वाला है। निर्देशक आदित्य धर ने इस फ्रेंचाइजी के जरिए दर्शकों के बीच जो जादू चलाया है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।
एक तरफ जहां यह फिल्म अपने शानदार एक्शन, कमाल के विजुअल्स (VFX) और बॉक्स ऑफिस पर छप्परफाड़ कमाई के जरिए पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक नया 'बेंचमार्क' (पैमाना) बन गई है, वहीं दूसरी तरफ इसने एक बहुत बड़ी बहस को भी जन्म दे दिया है। हमारे देश के बुद्धिजीवी, फिल्म क्रिटिक्स (समीक्षक) और आम जनता इस फिल्म को लेकर दो अलग-अलग गुटों में बंट गए हैं। सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक, बस यही चर्चा है कि क्या यह फिल्म भारतीय जासूसी कहानियों (Spy Universe) की सबसे बेहतरीन फिल्म है, या फिर यह सिर्फ सत्ता और राजनीति को खुश करने वाला एक छिपा हुआ एजेंडा (प्रोपेगेंडा) है?
इस पूरी कहानी को और इसके पीछे छिपे सच को गहराई से समझने के लिए, हमें उस 'पागलपन' को समझना होगा जो सिनेमाघरों के बाहर लंबी लाइनों और अंदर बजने वाली तालियों-सीटियों के रूप में दिख रहा है। जब आप थियेटर में बैठते हैं, तो हर दस मिनट में लोग खड़े होकर चिल्लाते हैं। यह सिर्फ सिनेमा का जादू नहीं है, बल्कि यह लोगों के गुस्से, देशप्रेम और एक 'हीरो' को जीतते हुए देखने की उस चाहत का नतीजा है, जो उनके अंदर सालों से दबी हुई थी। आइए, सबसे पहले बात करते हैं उन आंकड़ों की, जो चीख-चीख कर इस फिल्म की कामयाबी की गवाही दे रहे हैं।
बॉक्स ऑफिस का तूफान: कमाई के आंकड़े जो आपने पहले कभी नहीं देखे
एक दर्शक और सिनेमा प्रेमी के तौर पर, हमने बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों को हिट और फ्लॉप होते कई बार देखा है। लेकिन 'धुरंधर 2' का मामला बिल्कुल अलग है। आम तौर पर, किसी भी फिल्म की पहले दिन की कमाई (Day 1 Collection) इस बात पर निर्भर करती है कि फिल्म का प्रमोशन कैसा हुआ है और उसमें कौन सा बड़ा हीरो है। लेकिन यहाँ कहानी सिर्फ 'स्टार पावर' की नहीं है, बल्कि यह फिल्म एक 'सोशल फेनोमेनन' (सामाजिक घटना) बन चुकी है। 18 मार्च को फिल्म रिलीज होने से एक दिन पहले इसका 'पेड प्रिव्यू' (स्पेशल शो) रखा गया था। देश भर में सर्वर क्रैश हो गए, कई जगह शो देरी से शुरू हुए, लेकिन फिर भी सिर्फ इन गिने-चुने शोज से फिल्म ने ₹43 करोड़ की बंपर कमाई कर ली।
जब 19 मार्च को फिल्म पूरी तरह से देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इसने इतिहास के पन्नों पर अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखवा लिया। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, फिल्म ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर लगभग ₹150 करोड़ का जादुई आंकड़ा छू लिया है। यह कोई छोटी बात नहीं है! शुक्रवार की कमाई में 59.5% का भारी उछाल देखा गया, जो यह साफ बताता है कि लोगों में इस फिल्म को देखने की कितनी भयंकर बेताबी है। लोग अपनी छुट्टियां कैंसिल करके फिल्म देखने जा रहे हैं।
आइए इसे आम आदमी की नजर से समझते हैं। आज के समय में जब लोग सिनेमाघरों में जाने से कतराते हैं और ओटीटी (OTT) पर फिल्मों का इंतजार करते हैं, तब एक फिल्म का लोगों को घरों से बाहर निकालकर थियेटर तक खींच लाना बहुत बड़ी बात है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है फिल्म का 'वायरल कंटेंट' बनना। आजकल दर्शक सिर्फ फिल्म देखने नहीं जाते, वो उस पल को अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करते हैं। सिनेमाघरों में लोग फिल्म के खास और एक्शन से भरे सीन्स की वीडियो बना रहे हैं और उसे इंस्टाग्राम रील्स या वॉट्सऐप स्टेटस पर लगा रहे हैं। यह उनके लिए एक मेडल या ट्रॉफी जैसा बन गया है कि "देखो, मैंने भी धुरंधर 2 देख ली।"
फिल्म लगभग 3 घंटे 49 मिनट लंबी है। आज के समय में, जब लोगों का ध्यान 30 सेकंड की रील से भी भटक जाता है, इतनी लंबी फिल्म किसी को भी बोर कर सकती है। लेकिन 'धुरंधर 2' के साथ ऐसा नहीं है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक (BGM) इतना दमदार है और हर 10-15 मिनट में ऐसे धमाकेदार एक्शन और स्लो-मोशन सीन्स आते हैं कि दर्शक अपनी सीट से चिपक कर रह जाते हैं। यह फिल्म आपको सोचने का मौका ही नहीं देती, बस आपको एक अलग ही रोमांच के सफर पर ले जाती है।
| भाषा (Language) | पहले दिन की कमाई (करोड़ में - नेट) |
|---|---|
| हिंदी (Hindi) | ₹99.10 करोड़ |
| तेलुगु (Telugu) | ₹2.12 करोड़ |
| तमिल (Tamil) | ₹1.16 करोड़ |
| मलयालम (Malayalam) | ₹0.09 करोड़ |
| कन्नड़ (Kannada) | ₹0.08 करोड़ |
कहानी के सात अध्याय: जसकीरत से 'हम्जा' बनने का दर्दनाक सफर
इस फिल्म के डायरेक्टर आदित्य धर ने एक बहुत बड़ा और रिस्की दांव खेला है। उन्होंने पहली फिल्म के रिलीज होने के सिर्फ तीन महीने बाद ही इसका दूसरा भाग रिलीज कर दिया। यह कोई तुक्का नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी ताकि दर्शकों के दिमाग में पहली फिल्म की कहानी एकदम ताज़ा रहे। 'धुरंधर 2' की कहानी कोई सीधी-सादी कहानी नहीं है, बल्कि यह सात अलग-अलग हिस्सों (Chapters) में बंटी हुई है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे एक सीधा-साधा इंसान हालात का मारा होकर एक खतरनाक जासूस बन जाता है।
आइए इन सातों अध्यायों (Chapters) को आसान भाषा में समझते हैं:
- चैप्टर 1: एक जली हुई याद (A Burnt Memory): यह फिल्म की नींव है। यहाँ जसकीरत सिंह रंगी (रणवीर सिंह) के अतीत का वह काला सच दिखाया गया है, जहाँ जमीन के एक छोटे से विवाद में गुंडों ने उसके पिता को मार डाला और उसकी बहनों की जिंदगी बर्बाद कर दी। गुस्से में अंधा होकर जब जसकीरत उन गुंडों को मारता है, तो पीछे दीवाली के पटाखे एक 'सुदर्शन चक्र' बनाते हैं। यह सीन बताता है कि वह कोई मुजरिम नहीं, बल्कि बुराई के खिलाफ लड़ रहा है।
- चैप्टर 2: अतीत के साये (Ghosts from the Past): जेल में फांसी की सजा का इंतजार कर रहे जसकीरत को अजय सन्याल (आर. माधवन) एक सीक्रेट मिशन 'ऑपरेशन धुरंधर' के लिए चुनते हैं। यहीं से उसकी पुरानी पहचान हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।
- चैप्टर 3: अग्नि परीक्षा (Trial by Fire): यह हिस्सा दिखाता है कि कैसे एक आम इंसान को अपनी पहचान छिपाकर एक खूंखार जासूस बनने की बेहद मुश्किल ट्रेनिंग दी जाती है।
- चैप्टर 4: लुसिफर (Lucifer): यह सबसे दिलचस्प हिस्सा है। जसकीरत अब 'हम्जा अली मज़ारी' बन चुका है और पाकिस्तान के एक खतरनाक गैंग में शामिल हो गया है। सोचिए, एक इंसान को उन लोगों के साथ उठना-बैठना और खाना पड़ रहा है, जिनसे वह सबसे ज्यादा नफरत करता है। यह दिमागी तौर पर बहुत थका देने वाला काम है।
- चैप्टर 5: अज्ञात व्यक्ति (Unknown Men): इस चैप्टर में सबसे ज्यादा गोलियां चलती हैं और एक्शन होता है। हम्जा पाकिस्तान के अंदर घुसकर भारत के दुश्मनों को एक-एक करके ठिकाने लगाता है।
- चैप्टर 6: प्रतिशोध (The Revenge): फिल्म का वह हिस्सा जिसका सबको इंतजार था। मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) और हम्जा के बीच की आमने-सामने की टक्कर।
- चैप्टर 7: धुरंधर (Dhurandhar): फिल्म का क्लाइमेक्स, जहाँ मिशन पूरा होता है लेकिन एक ऐसा ट्विस्ट आता है जिसे देखकर दर्शकों का दिमाग घूम जाता है।
फिल्म की शुरुआत ही गीता के एक श्लोक से होती है, जो दर्शकों को यह समझा देती है कि फिल्म में जो भी खून-खराबा हो रहा है, वह एक 'धर्म युद्ध' है। लेकिन यहाँ कुछ कमियां भी हैं। कई फिल्म क्रिटिक्स ने सवाल उठाया है कि जो जासूस 10 साल से दुश्मन के देश में है, वह अपनी हिट-लिस्ट (डायरी) घर की अलमारी में कैसे भूल सकता है? और उसकी पत्नी को वह डायरी इतनी आसानी से कैसे मिल जाती है? यह बात पचती नहीं है। लेकिन सच कहूं तो, जब आम दर्शक सिनेमा हॉल में बैठा होता है, तो वह इन छोटी-मोटी गलतियों पर ध्यान नहीं देता, क्योंकि वह फिल्म की भावनाओं में पूरी तरह डूब चुका होता है।
शानदार एक्टिंग और बेजोड़ तकनीक: हर कलाकार ने दी अपनी जान
अगर हम तकनीकी नजरिए (Technical Aspects) से बात करें, तो 'धुरंधर 2' भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों की लिस्ट में टॉप पर आती है। डायरेक्टर आदित्य धर ने हॉलीवुड को टक्कर देने वाला काम किया है। लेकिन इस फिल्म की असली जान इसके कलाकार हैं, जिन्होंने अपने रोल्स में अपनी पूरी आत्मा डाल दी है। रणवीर सिंह ने इस फिल्म में जो ऊर्जा और पागलपन दिखाया है, उसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
एक जासूस की दोहरी जिंदगी जीना, अंदर ही अंदर अपने पिता की मौत का गम सहना और फिर देश के लिए एक मशीन की तरह दुश्मनों को मारना—रणवीर सिंह ने इन सभी भावनाओं को अपनी आंखों और हाव-भाव से पर्दे पर उतार दिया है। कई बड़े समीक्षकों का मानना है कि इस बार नेशनल अवार्ड रणवीर सिंह का ही है। वहीं दूसरी तरफ, आर. माधवन (अजय सन्याल) ने एक ऐसा किरदार निभाया है जो बहुत शांत है, लेकिन उसकी आंखों में एक आग है। उनका किरदार रियल लाइफ के अजित डोभाल जी से प्रेरित लगता है। फिल्म के भारी-भरकम तनाव के बीच माधवन एक ठहराव लेकर आते हैं।
फिल्म में लगातार मार-काट और टेंशन चलती रहती है, लेकिन बीच-बीच में राकेश बेदी की कॉमेडी दर्शकों को हंसने और सांस लेने का मौका देती है। कई लोग तो उन्हें फिल्म का 'शो स्टीलर' (महफिल लूटने वाला) कह रहे हैं। संजय दत्त और अर्जुन रामपाल ने भी विलेन के रूप में गजब का काम किया है। अर्जुन रामपाल ने मेजर इकबाल के किरदार में भारत के प्रति जो नफरत दिखाई है, वह आपको उनसे चिढ़ पैदा करने के लिए काफी है।
| कलाकार (Actor) | किरदार और उसका प्रभाव (Role & Impact) |
|---|---|
| रणवीर सिंह | जसकीरत / हम्जा: एक ऐसा जासूस जो दर्द और बदले की आग में जल रहा है। इनका काम नेशनल अवार्ड के लेवल का है। |
| आर. माधवन | अजय सन्याल: एक मास्टरमाइंड हैंडलर। बेहद शांत, चतुर और देश के लिए कुछ भी कर गुजरने वाला व्यक्ति। |
| अर्जुन रामपाल | मेजर इकबाल: खूंखार पाकिस्तानी अफसर जो भारत से नफरत करता है। फिल्म का मुख्य विलेन। |
| राकेश बेदी | कॉमेडी से भरपूर किरदार, जो फिल्म की सीरियसनेस के बीच दर्शकों को हंसाने का काम करता है। |
"धुरंधर 2 केवल एक ब्लॉकबस्टर फिल्म नहीं है, बल्कि यह आज के भारत की उस मानसिकता का आईना है जो 'पूर्ण विजय' और दुश्मनों के खिलाफ 'त्वरित न्याय' की भूखी है।"
— एक वरिष्ठ फिल्म विश्लेषकसिनेमा या राजनीतिक एजेंडा? क्या है प्रोपेगेंडा का सच
अब आते हैं उस मुद्दे पर जिसकी वजह से पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। एक निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर यह बताना जरूरी है कि 'धुरंधर: द रिवेंज' सिर्फ एक टाइमपास मनोरंजन नहीं है। इस फिल्म में आज के समय की असल राजनीति को बहुत चालाकी से कहानी में बुना गया है। कई बड़े मीडिया संस्थानों और पत्रकारों ने इसे "सरकार का प्रचार करने वाली फिल्म" (PR Campaign) तक कह दिया है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है फिल्म में 2016 की 'नोटबंदी' (Demonetization) को दिखाने का तरीका। फिल्म की कहानी के अनुसार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) भारत की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बर्बाद करने के लिए ₹60,000 करोड़ के जाली नोट (नकली मुद्रा) देश में भेजने वाली थी। इस खतरनाक साजिश को रोकने के लिए ही 8 नवंबर को रातों-रात नोटबंदी का फैसला लिया गया। फिल्म में इस फैसले को एक 'मास्टरस्ट्रोक' (ब्रह्मास्त्र) की तरह दिखाया गया है। आलोचकों का कहना है कि यह सच्चाई से कोसों दूर है, क्योंकि असलियत में आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार सारा पैसा बैंकों में वापस आ गया था। आलोचकों का मानना है कि फिल्म असल तथ्यों को छिपाकर एक झूठी जीत का जश्न मना रही है।
इसके अलावा फिल्म में कुछ और भी विवादित चीजें हैं। जैसे एक सीन में अजय सन्याल एक आतंकी को गोली मारने से पहले उससे जबरदस्ती "भारत माता की जय" बुलवाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे सीन समाज में नफरत और भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा (Mob Lynching) को सही ठहराते हैं। साथ ही, फिल्म में यह दिखाया गया है कि देश में नकली नोट बांटने का काम कुछ खास मीट की दुकानों, एनजीओ (NGOs) और यूनिवर्सिटीज के जरिए किया जा रहा है। यह बात सोशल मीडिया पर चलने वाले राजनीतिक नैरेटिव (कहानियों) से बहुत ज्यादा मेल खाती है।
दूसरी तरफ, पाकिस्तान को फिल्म में बहुत ही कमजोर और बेवकूफ दिखाया गया है, जो हर बार भारतीय जासूसों से मात खा जाता है। आम दर्शक जो रोज टीवी न्यूज़ पर भारत-पाकिस्तान की बहस देखते हैं, उन्हें पर्दे पर यह देखकर बहुत संतुष्टि मिलती है। लोगों को लगता है कि काश असल जिंदगी में भी आतंकवाद जैसी जटिल समस्याओं का हल फिल्म के हीरो की तरह एक बंदूक की गोली से निकाला जा सकता। यह फिल्म लोगों की भावनाओं को बहुत अच्छे से भुनाती है।
| मुद्दा (Issue) | आलोचकों की राय (What Critics Say) |
|---|---|
| कहानी और लॉजिक | कहानी में बहुत झोल हैं, डायरी का मिलना बचकाना है। इसे एक कमजोर जासूसी कहानी बताया गया। |
| हिंसा (Violence) | फिल्म में जरूरत से ज्यादा खून-खराबा है, जो कुछ लोगों को मानसिक रूप से परेशान कर सकता है। |
| राजनीति (Politics) | नोटबंदी को मास्टरस्ट्रोक बताना और खास तबकों को टारगेट करना सीधे-सीधे प्रोपेगेंडा का हिस्सा है। |
भविष्यवाणियां और आम जनता पर असर: आगे क्या होगा?
बॉक्स ऑफिस की इस आंधी को देखकर यह भविष्यवाणी करना बहुत आसान है कि यह फिल्म अपनी पूरी कमाई में ₹1000 करोड़ का आंकड़ा भी पार कर सकती है। इस फिल्म ने साउथ और नॉर्थ की फिल्मों के बीच की दीवार को भी गिरा दिया है। महेश बाबू और जूनियर एनटीआर जैसे साउथ के बड़े सुपरस्टार्स ने खुद सामने आकर रणवीर सिंह की एक्टिंग और आदित्य धर के डायरेक्शन की तारीफ की है। इससे यह साबित होता है कि भाषा कोई भी हो, अगर कहानी में दम है और देशप्रेम का जज्बा है, तो पूरा भारत एक साथ फिल्म देखता है।
लेकिन इसका आम जनता के दिमाग पर क्या असर पड़ेगा? मनोवैज्ञानिकों की मानें तो इस तरह की फ़िल्में लोगों के अंदर 'अति-राष्ट्रवाद' (Hyper-nationalism) की भावना पैदा करती हैं। जब एक युवा सिनेमाघर से बाहर निकलता है, तो उसका खून खौल रहा होता है। वह दुनिया की हर समस्या को 'हम बनाम वो' (Us vs Them) के नजरिए से देखने लगता है। सिनेमा एक बहुत ताकतवर माध्यम है और जब यह ऐतिहासिक घटनाओं को अपने हिसाब से मोड़कर पेश करता है, तो कई बार लोग उस फिल्मी कहानी को ही असली इतिहास मान बैठते हैं।
फिल्म का रनटाइम 3 घंटे 49 मिनट है और इसे A (सिर्फ वयस्कों के लिए) सर्टिफिकेट मिला है। यह कोई पारिवारिक फिल्म नहीं है जिसे आप छोटे बच्चों के साथ देख सकें। फिल्म में जिस क्रूरता के साथ दुश्मनों को मारा गया है, वह कमजोर दिल वालों के लिए बिल्कुल नहीं है। लेकिन फिर भी, युवा वर्ग इस 'एड्रेनालाईन रश' (जोश) को महसूस करने के लिए बार-बार थियेटर जा रहा है।
- फिल्म ने पहले ही दिन सारे रिकॉर्ड तोड़कर साबित कर दिया है कि सिनेमा अभी मरा नहीं है।
- रणवीर सिंह के करियर को इस फिल्म ने एक नई और सबसे ऊंची उड़ान दी है।
- भारतीय फिल्मों में 'स्पाई यूनिवर्स' (जासूसी कहानियों) का ट्रेंड अब और भी ज्यादा हावी होने वाला है।
- फिल्म की राजनीतिक कहानी आने वाले चुनावों और सामाजिक बहसों में एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।
निष्कर्ष: मास्टरपीस सिनेमा या खतरनाक दांव? (Final Verdict)
अगर हम 'धुरंधर: द रिवेंज' का पूरा विश्लेषण करें, तो एक बात बिल्कुल साफ है कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए एक बहुत बड़ा 'टर्निंग पॉइंट' (नया मोड़) है। अगर सिर्फ फिल्म मेकिंग, तकनीक, कैमरा वर्क और एक्टिंग की बात करें, तो यह एक मास्टरपीस (उत्कृष्ट कृति) है। आदित्य धर ने साबित कर दिया है कि वह बड़े पर्दे पर किसी भी बड़ी हॉलीवुड फिल्म को टक्कर दे सकते हैं। पहले ही दिन 150 करोड़ की बंपर कमाई यह चीख-चीख कर कह रही है कि दर्शकों ने इस फिल्म को सिर आंखों पर बिठा लिया है।
लेकिन एक समीक्षक के नजरिए से यह भी सच है कि फिल्म की सफलता सिर्फ इसकी कला की वजह से नहीं है। यह फिल्म आज के भारत के उस गुस्से और भावना का फायदा उठाती है, जो दुश्मन को उसी की भाषा में जवाब देना चाहता है। फिल्म की कहानी अपने फायदे के लिए नोटबंदी जैसी चीजों का इस्तेमाल करती है, जबकि कहानी का अपना लॉजिक कई जगह बहुत कमजोर पड़ जाता है।
अंतिम फैसला: क्या 'धुरंधर 2' सिनेमाई तौर पर एक बेहतरीन फिल्म है? बिल्कुल हाँ। क्या इसके राजनीतिक संदेश समाज में एक नई बहस और ध्रुवीकरण पैदा करेंगे? यह भी शत-प्रतिशत सच है। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस की जंग तो जीत ली है, लेकिन क्या सिनेमा का काम सिर्फ पैसा कमाना है या समाज को सही रास्ता दिखाना? यह बहस सालों तक चलती रहेगी। फिलहाल, टिकट खिड़की पर लगी लंबी लाइनें इस बात का सबूत हैं कि आम जनता ने अपना फैसला सुना दिया है।
1. 'धुरंधर: द रिवेंज' का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कितना है और क्या इसने कोई रिकॉर्ड तोड़ा है?
हाँ, 'धुरंधर: द रिवेंज' ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया है। फिल्म ने अपनी रिलीज के पहले ही दिन प्रिव्यू शोज़ की कमाई को मिलाकर भारत में लगभग ₹145.55 करोड़ नेट (₹172.63 करोड़ ग्रॉस) की ऐतिहासिक कमाई की है। हिंदी भाषा में ही इसने करीब 99 करोड़ का आंकड़ा छू लिया है, जो इसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी ओपनिंग फिल्मों में से एक बनाता है।
2. क्या फिल्म 'धुरंधर: द रिवेंज' देखने लायक है और इसकी कहानी क्या है?
अगर आपको एक्शन, स्पाई थ्रिलर्स और भव्य सिनेमा पसंद है, तो यह फिल्म आपके लिए है। कहानी भारतीय अंडरकवर जासूस जसकीरत सिंह रंगी (रणवीर सिंह) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो हमजा अली मजारी बनकर पाकिस्तान के लयारी इलाके में बलूच गैंग्स के बीच घुसपैठ करता है ताकि एक बड़े खतरे को टाल सके। हालांकि फिल्म में अत्यधिक हिंसा है, इसलिए इसे 'A' रेटिंग मिली है।
3. फिल्म में 2016 की नोटबंदी (Demonetization) का क्या कनेक्शन दिखाया गया है?
इस फिल्म के कथानक में नोटबंदी को एक बहुत बड़े स्ट्रैटेजिक मास्टरस्ट्रोक के रूप में दिखाया गया है। कहानी के अनुसार, आईएसआई (ISI) 60,000 करोड़ रुपये की जाली मुद्रा भारत में भेजने की साजिश रच रही थी। इसे विफल करने के लिए फिल्म के पात्र अजय सान्याल (आर. माधवन) और प्रधानमंत्री मिलकर नोटबंदी का फैसला लेते हैं, जिसे कई आलोचक एक राजनीतिक प्रोपेगेंडा मान रहे हैं।
4. 'धुरंधर: द रिवेंज' फिल्म का मुख्य विलेन कौन है और उसका किरदार कैसा है?
फिल्म में मुख्य प्रतिपक्षी (Villain) का नाम 'मेजर इकबाल' है, जिसे बॉलीवुड अभिनेता अर्जुन रामपुर ने निभाया है। मेजर इकबाल पाकिस्तान का एक बेहद क्रूर और खूंखार सैन्य अधिकारी है, जो भारत के प्रति गहरी नफरत रखता है। अर्जुन रामपुर के इस डार्क और इंटेंस किरदार की दर्शकों द्वारा खूब सराहना की जा रही है।
5. कई समीक्षक 'धुरंधर: द रिवेंज' को प्रोपेगेंडा फिल्म क्यों कह रहे हैं?
आलोचकों और 'द वायर' तथा 'ध्रुव राठी' जैसे स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि फिल्म जानबूझकर एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा देती है। फिल्म में नोटबंदी को न्यायोचित ठहराना, आतंकवादियों से "भारत माता की जय" के नारे लगवाना, और अत्यधिक हिंदू प्रतीकवाद (जैसे सुदर्शन चक्र और भगवद गीता) का उपयोग करके नायक की हिंसा को धार्मिक मान्यता देना, इसे एक प्रोपेगेंडा के रूप में कटघरे में खड़ा करता है।