डिएगो गार्सिया की इनसाइड स्टोरी: हिंद महासागर का वो सीक्रेट मिलिट्री बेस, जिसकी खातिर एक पूरे देश को उजाड़ दिया गया
हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित डिएगो गार्सिया सिर्फ एक टापू नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे ताकतवर अमेरिकी मिलिट्री बेस है।
जानिए कैसे नारियल के बागानों वाले इस शांत द्वीप को हथियारों के जखीरे में बदल दिया गया और इसके पीछे की असली कूटनीति क्या है।
1. डिएगो गार्सिया: एक ऐसा टापू जो पूरी दुनिया पर नज़र रखता है
कल्पना कीजिए, नीले समंदर के ठीक बीचों-बीच एक ऐसा टापू है जहाँ से दुनिया के सबसे खतरनाक बमवर्षक विमान उड़ान भरते हैं। यह कोई हॉलीवुड फिल्म का सीन नहीं है, बल्कि यह आज की असली सच्चाई है। हम बात कर रहे हैं 'डिएगो गार्सिया' (Diego Garcia) की। हिंद महासागर में स्थित यह सिर्फ एक मूंगे का टापू (कोरल एटोल) नहीं है। आज की तारीख में यह वह धुरी है जिस पर पूरी दुनिया की मिलिट्री पावर और जियो-पॉलिटिक्स का खेल टिका हुआ है।
जब भी हम हिंद महासागर की बात करते हैं, तो सबसे पहले दिमाग में डिएगो गार्सिया का नाम आता है। आज के समय में जब ईरान और चीन के साथ अमेरिका की टेंशन लगातार बढ़ रही है, तब अमेरिका ने यहाँ अपने छह 'B-2 स्टील्थ बॉम्बर्स' (B-2 Stealth Bombers) तैनात कर दिए हैं। ये वो विमान हैं जो रडार की पकड़ में नहीं आते और दुश्मन के घर में घुसकर तबाही मचा सकते हैं। अमेरिका के लिए यह टापू एक 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर' (कभी न डूबने वाला विमानवाहक पोत) बन चुका है।
लेकिन इस टापू की कहानी सिर्फ हथियारों और फाइटर जेट्स तक सीमित नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय कानून, पुराने जमाने के अंग्रेजों के कब्ज़े (औपनिवेशवाद) और एक बहुत बड़ी इंसानी त्रासदी की जीती-जागती मिसाल है। इस जगह को "हिंद महासागर का सेंटर" कहना सिर्फ भूगोल की बात नहीं है, बल्कि यह कूटनीति की एक बहुत बड़ी हकीकत है।
यहाँ से अमेरिकी वायुसेना एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के किसी भी कोने में चंद घंटों के अंदर हमला कर सकती है। वर्तमान समय में, यह टापू ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच दशकों पुराने मालिकाना हक (संप्रभुता) के विवाद का मुख्य केंद्र बना हुआ है। मॉरीशस का कहना है कि यह टापू उसका है, जबकि ब्रिटेन और अमेरिका इसे अपनी ग्लोबल सिक्योरिटी के लिए किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते।
आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ता है?
आप सोच रहे होंगे कि समंदर के बीच बने इस मिलिट्री बेस से भारत में बैठे आम आदमी का क्या लेना-देना है? दरअसल, दुनिया का ज्यादातर व्यापार और कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई हिंद महासागर के रास्तों से ही होती है। हमारे पेट्रोल पंपों पर जो पेट्रोल-डीजल आता है, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है।
डिएगो गार्सिया इन समुद्री रास्तों (जिन्हें SLOCs कहा जाता है) का एक तरह से 'बॉडीगार्ड' है। मुख्य जमीन से हजारों किलोमीटर दूर होने के कारण यह सीधे जमीनी हमलों से पूरी तरह सुरक्षित है। इसकी 'पावर प्रोजेक्शन' क्षमता इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों का रक्षक बनाती है। अगर इस इलाके में कोई गड़बड़ी होती है, तो पूरी दुनिया में पेट्रोल के दाम बढ़ सकते हैं और महंगाई आसमान छू सकती है।
"डिएगो गार्सिया सिर्फ एक मिलिट्री बेस नहीं है, यह हिंद महासागर में बिछी भू-राजनीति की बिसात का सबसे ताकतवर मोहरा है।"
ग्लोबल डिफेंस एक्सपर्ट्स
2. इतिहास के पन्नों से: कैसे खोजा गया यह 'रहस्यमयी' टापू?
इतिहास के पन्नों को अगर हम थोड़ा पीछे पलटें, तो पता चलता है कि यूरोपीय देशों के नक्शे पर डिएगो गार्सिया 16वीं शताब्दी की शुरुआत में दिखाई दिया। इतिहासकारों में इस बात को लेकर आज भी बहस होती है कि इस टापू का नाम पुर्तगाली नाविक 'पेड्रो मस्कारेन्हास' के नाम पर रखा गया या स्पेन के नाविक 'डिएगो गार्सिया' के नाम पर।
हालांकि, पुराने सबूत यह बताते हैं कि साल 1512 में 'डोम गार्सिया डी नोरोन्हा' के पुर्तगाली बेड़े ने सबसे पहले इस इलाके को खोजा था। आज भी यहाँ खुदाई में पुर्तगाली छतों की टाइलें (Roofing tiles) मिलती हैं। ये टाइलें पुर्तगाली जहाजों में वजन संतुलित करने (बैलास्ट) के लिए लाई जाती थीं। इससे यह साबित होता है कि पुर्तगाली नाविक अपने लंबे सफर के दौरान अक्सर इस टापू पर रुक कर आराम किया करते थे।
1555 का वो खौफनाक जहाज हादसा
इतिहास की एक बहुत ही रोमांचक और डरावनी घटना 1555 की है। पुर्तगाल का एक जहाज जिसका नाम 'नौ कॉन्सेइसाओ' (Nau Conceicao) था, वह खजाने से लदा हुआ था और इसी चागोस द्वीप समूह के इलाके में दुर्घटना का शिकार हो गया। जहाज समंदर की तेज लहरों और चट्टानों से टकराकर टूट गया।
इस जहाज का कप्तान, फ्रांसिस्को नोम्ब्रे, बहुत ही चालाक था। वह एक छोटी नाव लेकर चुपचाप भारत के 'कोचीन' (Cochin) भाग निकला। लेकिन जहाज पर मौजूद बाकी लोग वहीं फँस गए। वे उत्तरजीवी किसी तरह टूटे हुए जहाज के टुकड़ों (बेड़ों) के सहारे भारत के कोचीन और कन्नूर तक पहुँचे। भारत के साथ इस टापू का यह सबसे पहला और काफी दर्दनाक कनेक्शन था।
नारियल के बागान और 'ऑयल आइलैंड्स' का दौर
1790 के दशक में फ्रांसीसियों की नजर इस टापू पर पड़ी। उन्होंने यहाँ अपनी बस्तियां बसानी शुरू कर दीं। फ्रांसीसी लोग अफ्रीका और भारत से गुलाम मजदूरों को जहाजों में भरकर यहाँ लाए और उनसे नारियल के बागानों (Coconut Plantations) में काम करवाना शुरू किया।
यही वह समय था जब इस टापू को दुनिया भर में 'ऑयल आइलैंड्स' (Oil Islands) के नाम से जाना जाने लगा। उस दौर में यहाँ के नारियल तेल की डिमांड पूरी दुनिया के बाजारों में बहुत ज्यादा थी। लोग यहाँ पैदा हुए, पले-बढ़े और एक नई संस्कृति का जन्म हुआ, जिसे आज 'चागोसियन' संस्कृति कहा जाता है।
- भारतीय कनेक्शन (1792): एक ब्रिटिश जहाज के कप्तान ने डिएगो गार्सिया के पास दो भारतीय मजदूरों (जिन्हें 'लश्कर' कहा जाता था) को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि उसे डर था कि वे टापू पर रहने वाले कोढ़ियों (Lepers) के संपर्क में आकर पूरे जहाज में बीमारी फैला देंगे। यह शायद इस टापू पर स्थायी तौर पर रहने वाले पहले भारतीयों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड है।
- 1814 की पेरिस संधि: नेपोलियन की हार के बाद ग्लोबल पावर डायनामिक्स बदल गए। फ्रांस को मजबूरी में चागोस द्वीप समूह और मॉरीशस का पूरा कंट्रोल ब्रिटेन के हाथों में सौंपना पड़ा।
- ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा: 1786 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी रिचर्ड प्राइस ने यहाँ पहली बार जो झंडा फहराया था, वह ईआईसी (EIC) का झंडा था। दिलचस्प बात यह है कि इसी झंडे को बाद में अमेरिका के राष्ट्रीय ध्वज 'स्टार्स एंड स्ट्राइप्स' के मॉडल के रूप में देखा गया।
3. वर्ल्ड वॉर से लेकर कोल्ड वॉर तक: कैसे बना यह 'मिलिट्री किला'?
ब्रिटिश कंट्रोल आने के बाद इस टापू की किस्मत हमेशा के लिए बदल गई। नारियल के व्यापार से ध्यान हटाकर इसे मिलिट्री और सेना के काम में इस्तेमाल करने की प्लानिंग शुरू हो गई। बात 1914 की है जब प्रथम विश्व युद्ध (First World War) चल रहा था। जर्मनी का एक बहुत ही खतरनाक और कुख्यात युद्धपोत था जिसका नाम 'SMS Emden' था।
इस जर्मन जहाज ने भारत के मद्रास (चेन्नई) शहर पर बमबारी करके तबाही मचाई थी। बमबारी के बाद जब इस जहाज को मरम्मत की जरूरत पड़ी, तो यह गुपचुप तरीके से डिएगो गार्सिया पहुँच गया। उस समय डिएगो गार्सिया पर रहने वाले भोले-भाले निवासियों को यह पता ही नहीं था कि बाहरी दुनिया में कोई विश्व युद्ध भी चल रहा है! उन्होंने जर्मन नौसैनिकों का स्वागत किया।
1960 का दशक और ब्रिटेन-अमेरिका की 'सीक्रेट डील'
असली खेल शुरू हुआ 1960 के दशक में, जब दुनिया 'कोल्ड वॉर' (शीत युद्ध) की आग में जल रही थी। अमेरिका और सोवियत संघ (रूस) के बीच दुनिया पर कब्ज़ा जमाने की होड़ लगी थी। ऐसे में ब्रिटेन और अमेरिका ने हिंद महासागर में एक ऐसा मिलिट्री बेस बनाने की गुप्त योजना बनाई, जिसे कोई भेद न सके।
इसके लिए 1965 में ब्रिटेन ने एक बहुत ही चालाकी भरा और विवादित कदम उठाया। मॉरीशस को आजादी देने से ठीक पहले, ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग कर दिया। इस नए इलाके को नाम दिया गया 'ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र' (BIOT)। इसके बदले में मॉरीशस की सरकार को सिर्फ 3 मिलियन पाउंड का एक छोटा सा अनुदान थमा दिया गया। इसके तुरंत बाद, 1966 में, ब्रिटेन ने डिएगो गार्सिया को अमेरिका को मिलिट्री इस्तेमाल के लिए 50 साल की लीज पर दे दिया।
| डिएगो गार्सिया की खूबियां | रणनीतिक महत्व (Strategic Importance) |
|---|---|
| इतिहास के बड़े मिलिट्री ऑपरेशन | 1991 के खाड़ी युद्ध (Desert Storm), और बाद में इराक-अफगानिस्तान युद्धों के दौरान अमेरिकी बमवर्षक विमानों ने यहीं से उड़ान भरी थी। |
| पावर प्रोजेक्शन (Power Projection) | यहाँ से अमेरिका पूरे एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट पर 24 घंटे सातों दिन निगरानी (Surveillance) रख सकता है और कभी भी हमला कर सकता है। |
| एडवांस इंफ्रास्ट्रक्चर | यहाँ दुनिया का सबसे अत्याधुनिक संचार केंद्र (SIGINT), सैटेलाइट ट्रैकिंग सिस्टम और विशालकाय युद्धपोतों को खड़ा करने के लिए गहरे गोदी (Docking) मौजूद हैं। |
| अजेय सुरक्षा स्थिति | किसी भी मुख्य जमीन से 4000 किलोमीटर दूर होने के कारण यह दुश्मनों की मिसाइलों से सुरक्षित है, लेकिन यहाँ से अमेरिकी विमान ताइवान जलडमरूमध्य तक आराम से पहुँच सकते हैं। |
अमेरिका के लिए डिएगो गार्सिया का मतलब सिर्फ एक बेस नहीं, बल्कि एक 'ब्रह्मास्त्र' है। 1970 के दशक में, जब सोवियत संघ ने सोमालिया के 'बरबरा' में अपना नेवल बेस बनाया था, तब डिएगो गार्सिया ही अमेरिका का एकमात्र और सबसे तगड़ा जवाब था। आज के समय में, जब चीन हिंद महासागर में 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) नीति के तहत भारत और अमेरिका को घेरने की कोशिश कर रहा है, तब यह बेस अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक 'गेमचेंजर' है।
"डिएगो गार्सिया अमेरिका के लिए एक ऐसा हथियार है, जो बिना गोली चलाए ही दुश्मनों के पसीने छुड़ा देता है।"
रक्षा विश्लेषक4. चागोसियन लोगों का विस्थापन: आंसुओं और दर्द की एक अनकही दास्तां
मिलिट्री पावर और जियो-पॉलिटिक्स की इन बड़ी-बड़ी बातों के पीछे एक बहुत ही रुला देने वाली कहानी छिपी है। जब डिएगो गार्सिया को एक मिलिट्री किले में बदला जा रहा था, तब वहाँ सदियों से रह रहे मूल निवासियों को एक अकल्पनीय त्रासदी का सामना करना पड़ा। इन लोगों को 'चागोसियन' (Chagossians) कहा जाता था, जो क्रियोल भाषा बोलते थे।
1960 और 1970 के दशक के बीच, लगभग 2000 निर्दोष लोगों को उनके पुरखों की जमीन से जबरन और बेरहमी से निकाल दिया गया। अमेरिका और ब्रिटेन ने 'सुरक्षा की जरूरतों' का हवाला देकर एक पूरे समुदाय को रातों-रात बेघर कर दिया।
'ऑपरेशन कोंक्यूबाइन' और अमानवीय क्रूरता
अक्सर इंटरनेट पर एक नाम सुनने को मिलता है- 'ऑपरेशन कोंक्यूबाइन' (Operation Concubine)। कई लोग मानते हैं कि यह लोगों को निकालने का ऑपरेशन था। लेकिन असल में यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हवाई पट्टी बनाने के लिए किया गया एक सर्वे था। असली विस्थापन तो एक ऐसी क्रूरता थी जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
इन मासूम लोगों को अचानक एक दिन बताया गया कि अब उनका अपना घर, उनका अपना टापू एक 'प्रतिबंधित क्षेत्र' (Restricted Area) बन गया है। उन्हें वहां से जाने के लिए मजबूर किया गया। ब्रिटेन और अमेरिकी अधिकारियों की क्रूरता इस हद तक थी कि निवासियों के पालतू कुत्तों और जानवरों को एक शेड में बंद करके जहरीली गैस देकर मार दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोगों के मन में वापस लौटने की कोई भी उम्मीद बाकी न रहे और वे डर के मारे हमेशा के लिए वहां से चले जाएं।
- जबरन निर्वासन (Forced Exile): चागोसियन लोगों को मालवाहक जहाजों में जानवरों की तरह भरकर मॉरीशस और सेशेल्स के स्लम (झुग्गी-झोपड़ी) इलाकों में ले जाकर छोड़ दिया गया। वहाँ उनके पास न घर था, न नौकरी। उन्होंने दशकों तक भयंकर गरीबी, भुखमरी और मानसिक अवसाद का सामना किया।
- सांस्कृतिक मौत: यह सिर्फ जमीन का छिनना नहीं था, बल्कि एक पूरी संस्कृति की मौत थी। एक ऐसी नस्ल जो ताजी हवा, नारियल और मछलियों पर निर्भर थी, उसे अचानक आधुनिक शहरों की गंदी झुग्गियों में झोंक दिया गया। कई लोग तो 'दुख' (Sadness) की वजह से ही मर गए।
- दुनिया के लिए एक धब्बा: यह विस्थापन पूरी दुनिया के सामने इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया कि कैसे ताकतवर देश (महाशक्तियां) अपने फायदे के लिए मानवाधिकारों (Human Rights) और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को अपने जूतों तले रौंद सकते हैं।
यह घटना आज भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ब्रिटेन के लिए एक बहुत बड़ा 'पाप' और नैतिक बोझ बनी हुई है। एक हंसते-खेलते समुदाय को सिर्फ इसलिए उजाड़ दिया गया क्योंकि वाशिंगटन (अमेरिका) और लंदन (ब्रिटेन) की सरकारों को एक 'खाली' टापू चाहिए था। अपनी मिट्टी से दूर किए गए इन लोगों की न्याय की पुकार कभी शांत नहीं हुई, और अंततः यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालतों के गलियारों तक पहुँच गया।
5. अंतरराष्ट्रीय कानून और इंसाफ की एक लंबी कानूनी जंग
चागोसियन लोगों ने हार नहीं मानी। दशकों तक झुग्गियों में रहने के बावजूद, वे अपनी जमीन वापस पाने के लिए लड़ते रहे। दूसरी तरफ, मॉरीशस की सरकार ने भी कूटनीतिक स्तर पर ब्रिटेन पर भारी दबाव बनाना शुरू कर दिया। यह मुद्दा धीरे-धीरे संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law) की कसौटी पर आ खड़ा हुआ।
साल 2017 में एक बहुत बड़ा बदलाव आया। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने एक प्रस्ताव (संकल्प 71/292) पास किया और इस मामले को 'अंतरराष्ट्रीय न्यायालय' (ICJ - International Court of Justice) में भेज दिया। ब्रिटेन के लिए यह एक बहुत बड़ा कूटनीतिक तमाचा था, क्योंकि दुनिया के ज्यादातर देश मॉरीशस के समर्थन में आ गए थे।
2019 का वो ऐतिहासिक फैसला
फरवरी 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि 1965 में ब्रिटेन द्वारा चागोस को मॉरीशस से अलग करना पूरी तरह से "अवैध" (Illegal) था।
न्यायालय ने बहुत ही कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा: "मॉरीशस की विऔपनिवेशीकरण (Decolonization - यानी अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी) की प्रक्रिया 1968 में तब तक कानूनी रूप से पूरी नहीं मानी जा सकती, जब तक कि चागोस द्वीप समूह उसे वापस नहीं मिल जाता।"
| देश का रुख | प्रतिक्रिया और तर्क |
|---|---|
| मॉरीशस और चागोसियन | इस फैसले को सच्चाई और न्याय की जीत माना। उन्होंने ब्रिटेन से तुरंत टापू खाली करने की मांग की। |
| ब्रिटेन (UK) | शुरुआत में ब्रिटेन ने अपनी अकड़ दिखाते हुए इस फैसले को 'गैर-बाध्यकारी' (Non-binding) राय बताकर खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि यह दो देशों के बीच की बात है, कोर्ट की नहीं। |
| अमेरिका (USA) | अमेरिका ने पूरी तरह से ब्रिटेन का बचाव किया, क्योंकि उसे डर था कि अगर टापू मॉरीशस के पास गया, तो उनका मिलिट्री बेस खतरे में पड़ जाएगा। |
शुरू में ब्रिटेन अपने अड़ियल रवैये पर कायम रहा। लेकिन 2020 के बाद दुनिया बहुत तेजी से बदलने लगी। दक्षिण चीन सागर (South China Sea) और हिंद महासागर में चीन की ताकत और उसका प्रभाव बढ़ने लगा। ऐसे में ब्रिटेन को लगने लगा कि अगर वह खुद अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन नहीं करेगा, तो वह चीन को नियम तोड़ने से कैसे रोक पाएगा? अपनी 'ग्लोबल ब्रिटेन' की छवि को बचाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने से बचने के लिए, ब्रिटेन को आखिरकार मॉरीशस के साथ टेबल पर बैठकर समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
6. 2024-2025 का ऐतिहासिक समझौता: कागजों पर संप्रभुता, असल में कंट्रोल
मई 2025 का महीना ग्लोबल पॉलिटिक्स के लिए एक ऐतिहासिक महीना साबित हुआ। सालों की लंबी लड़ाई, कोर्ट के चक्कर और कूटनीतिक दबाव के बाद ब्रिटेन और मॉरीशस ने एक बहुत ही अहम संधि (Treaty) पर हस्ताक्षर किए। इसे आधुनिक इतिहास में 'मालिकान हक और मिलिट्री सिक्योरिटी' के बीच का सबसे बड़ा और स्मार्ट समझौता माना जा रहा है।
इस डील को समझने के लिए आपको इसके अंदर की बारीकियों को समझना होगा। यह सिर्फ जमीन वापस देने की बात नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा बिजनेस और सिक्योरिटी अग्रीमेंट है, जिसकी कीमत अरबों में है।
समझौते की अहम शर्तें क्या हैं?
- संप्रभुता हस्तांतरण (Sovereignty Transfer): सबसे बड़ी बात यह हुई कि ब्रिटेन ने आधिकारिक तौर पर मान लिया कि चागोस द्वीप समूह (और डिएगो गार्सिया) का असली मालिक मॉरीशस है। कागजों पर अब यह मॉरीशस का हिस्सा बन गया है।
- मिलिट्री बेस का भविष्य (99 साल की लीज): मॉरीशस को मालिकान हक तो मिल गया, लेकिन समझौते के तहत डिएगो गार्सिया का मिलिट्री बेस अगले 99 वर्षों तक पूरी तरह से ब्रिटेन और अमेरिका के ही कंट्रोल में रहेगा। मॉरीशस इस बेस के कामकाज में कोई दखल नहीं दे सकता।
- वित्तीय पैकेज (Financial Deal): इस टापू के इस्तेमाल के बदले में ब्रिटेन हर साल मॉरीशस को 101 मिलियन पाउंड (लगभग 1000 करोड़ रुपये) का भुगतान करेगा। कुल मिलाकर यह पूरी डील लगभग £3.4 बिलियन की मानी जा रही है। मॉरीशस जैसी छोटी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बहुत बड़ी रकम है।
- लीज का रिन्यूअल: अगर 99 साल बाद भी अमेरिका को लगता है कि उसे इस बेस की जरूरत है, तो इस लीज को अगले 40 सालों के लिए और बढ़ाया जा सकता है।
"यह एक 'विन-विन' डील है। मॉरीशस को अपना खोया हुआ सम्मान और भारी पैसा मिल गया, और अमेरिका को अगले 100 सालों के लिए अपना सबसे अहम मिलिट्री बेस मिल गया।"
जियो-पॉलिटिकल एनालिस्टचीनी दीवार (The China Factor): इस समझौते में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें एक खास 'गुप्त प्रावधान' (Secret clause) रखा गया है। इसके तहत मॉरीशस सरकार यह गारंटी देती है कि वह डिएगो गार्सिया के आसपास चीन जैसी किसी भी विरोधी ताकत को भटकने नहीं देगी। मॉरीशस चीन के साथ कोई भी ऐसा सैन्य या इंफ्रास्ट्रक्चर समझौता नहीं करेगा जिससे अमेरिकी बेस को कोई खतरा हो।
ब्रिटिश विदेश मंत्री 'डेविड लैमी' के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि ब्रिटेन कानूनों का पालन करता है (संप्रभुता वापस करके), लेकिन साथ ही उन्होंने अमेरिका के रणनीतिक हितों को 2124 तक के लिए सुरक्षित भी कर दिया।
7. भारत की नजर और चीन की बढ़ती चुनौती: एक मुश्किल बैलेंसिंग एक्ट
अब बात करते हैं भारत की। भारत के लिए डिएगो गार्सिया का मामला हमेशा से एक दोधारी तलवार की तरह रहा है। भारत के इस टापू के साथ पुराने ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। भारतीय रक्षा विशेषज्ञ अक्सर याद दिलाते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस टापू को भारतीय पैसों और भारतीय मजदूरों के दम पर ही आबाद किया था।
लेकिन आज की तारीख में भारत की स्थिति बहुत ही नपी-तुली (Balancing Act) है। भारत की रणनीति दो अलग-अलग पटरियों पर चलती है:
मॉरीशस का पक्का दोस्त
भारत ने हमेशा से मॉरीशस के मालिकाना हक (संप्रभुता) का खुलकर समर्थन किया है। भारत और मॉरीशस के बीच खून के रिश्ते हैं, गहरे सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध हैं। हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मॉरीशस की यात्रा करके इस दोस्ती को और भी मजबूत किया है। जब मॉरीशस अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में ब्रिटेन के खिलाफ लड़ रहा था, तब भी भारत ने मॉरीशस का पूरा साथ दिया था।
सुरक्षा की असली हकीकत (Security Realism)
एक समय था जब भारत डिएगो गार्सिया में अमेरिकी बेस का कड़ा विरोध करता था। भारत हमेशा से चाहता था कि "हिंद महासागर को एक शांति का क्षेत्र" (Zone of Peace) घोषित किया जाए। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान की कड़वी यादें भी हैं, जब अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना खतरनाक '7वां बेड़ा' (USS Enterprise) बंगाल की खाड़ी में भेजा था। उस समय डिएगो गार्सिया भारत के लिए एक सीधा खतरा था।
लेकिन आज वक्त बदल चुका है। आज भारत का सबसे बड़ा दुश्मन चीन है। चीन अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति के तहत श्रीलंका (हम्बनटोटा पोर्ट), मालदीव, पाकिस्तान (ग्वादर) और जिबूती में अपने मिलिट्री और नेवल बेस बना रहा है। चीन की इस आक्रामकता को देखते हुए भारत का नजरिया पूरी तरह से प्रैक्टिकल हो गया है।
आज की तारीख में भारत अंदर ही अंदर चाहता है कि डिएगो गार्सिया में अमेरिका (जो अब भारत का एक मजबूत रणनीतिक साझेदार है) की मौजूदगी बनी रहे। चीन को कंट्रोल करने के लिए इस इलाके में एक सुपरपावर का होना जरूरी है। भारत का फॉर्मूला साफ है: "जमीन मॉरीशस की हो (ताकि न्याय हो), लेकिन सुरक्षा की चाबी ऐसे हाथों में हो जो भारत के खिलाफ न हो (यानी अमेरिका)।"
8. डिएगो गार्सिया का पूरा टाइमलाइन: एक नजर में
आइए इस पूरे घटनाक्रम को एक आसान टाइमलाइन के जरिए समझते हैं कि कैसे एक अंजान टापू दुनिया का सबसे बड़ा मिलिट्री बेस बन गया:
| वर्ष / काल (Year) | प्रमुख ऐतिहासिक घटना (Key Event) |
|---|---|
| 16वीं सदी | पुर्तगाली नाविकों द्वारा इस टापू की खोज; यहाँ पुर्तगाली टाइलों के साक्ष्य मिले। |
| 1555 | पुर्तगाली जहाज 'नौ कॉन्सेइसाओ' का यहाँ डूबना; बचे हुए लोगों का भारत (कोचीन) पहुँचना। |
| 1786 | ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के रिचर्ड प्राइस द्वारा सर्वे और यहाँ पहली बार झंडा फहराना। |
| 1792 | दो भारतीय मजदूरों (लश्करों) को डिएगो गार्सिया में कोढ़ियों के साथ मरने के लिए छोड़ा गया। |
| 1814 | पेरिस की संधि: फ्रांसीसियों ने हार के बाद यह टापू ब्रिटेन को सौंप दिया। |
| 1914 | प्रथम विश्व युद्ध: खतरनाक जर्मन युद्धपोत 'SMS Emden' ने मरम्मत के लिए इस टापू का इस्तेमाल किया। |
| 1965 | ब्रिटेन ने चागोस को मॉरीशस से अलग करके ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र (BIOT) बनाया। |
| 1966 | ब्रिटेन ने टापू अमेरिका को लीज पर दिया; मूल निवासियों (चागोसियन) को क्रूरता से बाहर निकालना शुरू किया। |
| 2019 | अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) का ऐतिहासिक फैसला: कोर्ट ने ब्रिटिश कब्ज़े को अवैध ठहराया। |
| 2024-2025 | ऐतिहासिक डील: संप्रभुता मॉरीशस को मिली, लेकिन अमेरिका के पास 99 साल की लीज (£3.4 बिलियन का समझौता)। |
9. आगे क्या होगा? (भविष्य का विश्लेषण)
एक जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट के नजरिए से देखें, तो यह पूरी कहानी 'नायर फिश' (Narimeen) के रूपक (Metaphor) जैसी है। जब अंग्रेज भारत के मालाबार तट पर आए थे, तो उन्होंने यहाँ की मशहूर और स्वादिष्ट 'नरिमीन' मछली का नाम गलत सुनकर उसे 'नायर फिश' कहना शुरू कर दिया। ठीक इसी तरह, पश्चिमी देशों (अमेरिका और ब्रिटेन) ने डिएगो गार्सिया की असली हकीकत को कभी समझने की कोशिश ही नहीं की। उन्होंने वहाँ के मूल लोगों (चागोसियन) की संस्कृति को वैसे ही मिटा दिया जैसे उन्होंने नारियल के बागानों को उखाड़कर वहां कंक्रीट के रनवे बना दिए।
क्या 2036 के बाद अमेरिका यह बेस खाली कर देगा?
2025 की संधि ने इस सवाल का बहुत ही स्पष्ट जवाब दे दिया है- "बिल्कुल नहीं"। 99 साल की लीज और उसके बाद 40 साल के रिन्यूअल ऑप्शन का सीधा सा मतलब है कि अमेरिका अगली एक सदी (100 साल) तक इस टापू पर राज करेगा।
आजकल इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र में टेंशन अपने चरम पर है। चीन लगातार अपनी नौसेना बढ़ा रहा है। ऐसे माहौल में अमेरिका डिएगो गार्सिया जैसे 'तैयार और सुरक्षित' बेस को छोड़ने की बेवकूफी कभी नहीं करेगा। भविष्य में यहाँ सिर्फ फाइटर जेट्स ही नहीं, बल्कि ऑटोनॉमस ड्रोन्स, हाइपरसोनिक मिसाइल सिस्टम और AI-संचालित डिफेंस सिस्टम भी तैनात किए जाएंगे।
मॉरीशस के लिए आगे की चुनौती
मॉरीशस ने यह कूटनीतिक जंग जीतकर अपना नाम तो इतिहास में दर्ज करवा लिया है, लेकिन उसकी असली परीक्षा अब शुरू होगी। मॉरीशस को एक तरफ ब्रिटेन से मिलने वाले पैसों और अमेरिका के मिलिट्री बेस को संभालना है, तो दूसरी तरफ उसे चीन के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को भी बैलेंस करना होगा। अगर मॉरीशस ने चीन से कोई भारी लोन लिया या चीनी कंपनियों को ठेके दिए, तो अमेरिका और ब्रिटेन तुरंत उस पर दबाव बनाना शुरू कर देंगे।
निष्कर्ष: न्याय और ताकत के बीच का समझौता
डिएगो गार्सिया की यह पूरी कहानी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को हमारे सामने रखती है जहाँ 'आदर्शवाद' (यानी मानवाधिकार, न्याय और संप्रभुता) हमेशा 'यथार्थवाद' (यानी मिलिट्री पावर, हथियार और ग्लोबल सिक्योरिटी) के सामने घुटने टेक देता है। दुनिया में हमेशा उसी की बात मानी जाती है जिसके पास ताकत होती है।
2024-2025 का यह समझौता न्याय और मजबूरी के बीच निकाला गया एक 'बीच का रास्ता' (Middle Ground) है। उन बेघर हुए चागोसियन लोगों के लिए यह आज भी अधूरा इंसाफ ही है। वे कागजों पर मॉरीशस के नागरिक बनकर शायद अपने आसपास के टापुओं पर लौट तो आएं, लेकिन डिएगो गार्सिया का वो 'प्रतिबंधित इलाका' (Restricted Area) जहाँ उनके पुरखों की कब्रें हैं, वह उनके लिए अगले 100 सालों तक एक सपना ही रहेगा।
अंत में यही कहा जा सकता है कि हिंद महासागर की उठती-गिरती लहरों के बीच, डिएगो गार्सिया आने वाली कई सदियों तक दुनिया की ताकत का वह खौफनाक केंद्र बना रहेगा, जहाँ एक तरफ शांति की गुहार लगाई जाती रहेगी और दूसरी तरफ महाविनाशकारी युद्ध की तैयारियां खामोशी से चलती रहेंगी।
1. डिएगो गार्सिया कहाँ स्थित है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के ठीक बीचों-बीच स्थित एक मूंगे का टापू (कोरल एटोल) है। यह रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मुख्य जमीनों से हजारों किलोमीटर दूर होने के कारण सुरक्षित है, लेकिन यहाँ से अमेरिका पूरे एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका पर निगरानी रख सकता है और किसी भी वक्त अपनी सेना और बमवर्षक विमानों (जैसे B-2 बॉम्बर) से हमला कर सकता है। इसे अमेरिका का 'अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर' भी कहा जाता है।
2. चागोसियन लोग कौन हैं और उनके साथ क्या हुआ था?
चागोसियन लोग डिएगो गार्सिया और आसपास के टापुओं के मूल निवासी थे, जो पीढ़ियों से वहाँ नारियल की खेती और मछली पालन करते थे। 1960 और 70 के दशक में, जब अमेरिका और ब्रिटेन ने वहाँ मिलिट्री बेस बनाने का फैसला किया, तो लगभग 2000 चागोसियन लोगों को जबरन, और बहुत ही क्रूरता के साथ, जहाजों में भरकर मॉरीशस और सेशेल्स की झुग्गियों में निर्वासित कर दिया गया। उन्हें आज तक अपने घर लौटने का हक नहीं मिला है।
3. डिएगो गार्सिया को लेकर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच क्या विवाद था?
1965 में, मॉरीशस को आजादी देने से ठीक पहले, ब्रिटेन ने अवैध रूप से चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग कर लिया था। मॉरीशस का तर्क था कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ है और पूरा टापू उसका है। दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद, 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने मॉरीशस के पक्ष में फैसला सुनाया और ब्रिटेन के कब्जे को अवैध बताया।
4. 2024-2025 के समझौते में क्या तय हुआ है?
मई 2025 में हुए एक ऐतिहासिक समझौते के तहत, ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह का मालिकाना हक (संप्रभुता) मॉरीशस को सौंप दिया है। लेकिन, इसके बदले में डिएगो गार्सिया का मिलिट्री बेस अगले 99 सालों तक ब्रिटेन और अमेरिका के नियंत्रण में ही रहेगा। इस डील के लिए ब्रिटेन मॉरीशस को सालाना लगभग £101 मिलियन (कुल £3.4 बिलियन) का भुगतान करेगा।
5. डिएगो गार्सिया के मामले में भारत का क्या स्टैंड है?
भारत की कूटनीति इस मामले में बहुत संतुलित है। एक तरफ भारत ने हमेशा से अपने करीबी दोस्त मॉरीशस के मालिकाना हक का खुलकर समर्थन किया है। लेकिन दूसरी तरफ, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसेना और आक्रामकता ('स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स') को देखते हुए, भारत अंदरूनी तौर पर चाहता है कि डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सेना मौजूद रहे, ताकि क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बना रहे और चीन को हावी होने से रोका जा सके।