अमेरिका-ईरान तनाव: युद्ध टालने के लिए इस्लामाबाद बना कूटनीति का नया केंद्र
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच एक महीने से चल रहे विनाशकारी युद्ध के बीच अब कूटनीति की उम्मीद जागी है। पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब मिलकर एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
इस्लामाबाद इस समय पूरी दुनिया की कूटनीति का हॉटस्पॉट बन गया है, जहाँ वाशिंगटन और तेहरान के बीच सीधी बातचीत का रास्ता साफ करने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं।
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शांति के लिए 4 देशों का महामंथन
इस महीने की शुरुआत में रियाद में अरब देशों की एक अहम बैठक हुई थी। उसी के आधार पर अब इस्लामाबाद में शांति का रास्ता तलाशा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि पहले यह बैठक तुर्की में होनी तय हुई थी, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुँचाने में पाकिस्तान की अहम भूमिका को देखते हुए इसे इस्लामाबाद शिफ्ट कर दिया गया।
इस बैठक में पाकिस्तान और तुर्की के विदेश मंत्री खास तौर पर शामिल हैं। यहाँ पाकिस्तान एक 'मुख्य वार्ताकार' के रूप में उभरा है, जिसे चीन का पूरा सपोर्ट मिल रहा है। जानकारों का मानना है कि चीन के इस बैकअप की वजह से ही ईरान बेझिझक बातचीत की मेज पर आ सका है।
- पाकिस्तान: अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य संदेशवाहक का काम कर रहा है।
- तुर्की: इलाके में शांति बनाए रखने के लिए बाकी देशों को एकजुट कर रहा है।
- मिस्र: सुरक्षा का बैलेंस बनाने और बातचीत कराने में मदद कर रहा है।
- सऊदी अरब: खाड़ी देशों के व्यापार और बुनियादी ढांचे को बचाने की फिक्र कर रहा है।
बातचीत में सबसे बड़ी अड़चन: भरोसे की कमी
बातचीत शुरू होने से ठीक पहले, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान ने फोन पर करीब डेढ़ घंटे तक लंबी बात की। पिछले 5 दिनों में यह उनकी दूसरी बातचीत थी। असल समस्या यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की बहुत बड़ी खाई है, जिसे पाटना आसान नहीं है।
| मुख्य समस्या | भरोसे की भारी कमी (Trust Deficit) |
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व्यापार पर युद्ध की मार
इन देशों को शांति की इतनी जल्दी इसलिए भी है क्योंकि युद्ध का असर इनके व्यापार पर साफ दिखने लगा है। बहरीन और यूएई के बड़े एल्युमिनियम प्लांट्स को नुकसान पहुँचा है। अगर ईरान ने अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर जवाबी हमले किए, तो पूरी खाड़ी की अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है। यही डर सऊदी और यूएई को शांति का समर्थन करने पर मजबूर कर रहा है.
| आर्थिक नुकसान का केंद्र | बहरीन और यूएई के एल्युमिनियम संयंत्र |
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"पहले भी ऐसा हुआ है कि बातचीत और हमले एक साथ चलते रहे हैं। इसलिए वाशिंगटन पर आँख बंद करके भरोसा करना मुश्किल है। बिना ठोस सबूत के हम सिर्फ बातों में नहीं आ सकते।"
- मसूद पेजेशक्यान, ईरान के राष्ट्रपतिपाकिस्तान की भूमिका और संभावित बातचीत
पाकिस्तान का कहना है कि उसका काम सिर्फ रास्ता दिखाना है, आगे बढ़ना या न बढ़ना अमेरिका और ईरान पर निर्भर है। अगर इस्लामाबाद की यह कोशिश सफल रही, तो जल्द ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और ईरान के अब्बास अरागची के बीच सीधी बातचीत हो सकती है। इसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी अहम रोल निभा सकते हैं।
| संभावित वार्ताकार | मार्को रूबियो (अमेरिका) और अब्बास अरागची (ईरान) |
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ईरान की 4 बड़ी मांगें
- हमले तुरंत रुकें: किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई और टारगेट किलिंग फौरन बंद हो।
- नुकसान की भरपाई: युद्ध में ईरान की संपत्तियों को जो नुकसान हुआ है, उसका हर्जाना मिले।
- सुरक्षा की गारंटी: भविष्य में कोई बाहरी देश हमला नहीं करेगा, इसका पक्का भरोसा दिया जाए।
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य: इस अहम समुद्री रास्ते पर ईरान के दबदबे को स्वीकार किया जाए।
आगे क्या होगा?
आने वाले दो-तीन दिन बहुत ही नाजुक और अहम होने वाले हैं। पाकिस्तान ने अपनी तरफ से एक ठोस जमीन तैयार कर दी है और बातचीत का मंच सजा दिया है।
अब गेंद वाशिंगटन और तेहरान के पाले में है। अगर यह कूटनीतिक कोशिश नाकाम होती है, तो यह छोटा सा युद्ध एक भयंकर महायुद्ध में बदल सकता है। पूरी दुनिया की नजरें अब इसी फैसले पर टिकी हैं।
क्या कूटनीति की यह नई पहल युद्ध के बादलों को छांट पाएगी? इसका जवाब आने वाले कुछ ही घंटों में मिल जाएगा।
शांति वार्ता कहाँ आयोजित की जा रही है?
शांति वार्ता और कूटनीतिक बैठकें पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित की जा रही हैं।
इस कूटनीतिक पहल में कौन से चार देश शामिल हैं?
इस महत्वपूर्ण बैठक में पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब शामिल हैं।
शांति वार्ता में पाकिस्तान का क्या रोल है?
पाकिस्तान इस पूरे मामले में अमेरिका और ईरान के बीच एक मुख्य मध्यस्थ और संदेशवाहक (सुविधाप्रदाता) का काम कर रहा है।
ईरान को बातचीत में सबसे बड़ा डर क्या है?
ईरान को अमेरिका पर भरोसे की बहुत कमी है। उनका मानना है कि अमेरिका पहले भी बातचीत के बहाने हमले करता रहा है, इसलिए वे पहले ठोस सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं।
युद्ध का खाड़ी देशों पर क्या असर पड़ रहा है?
युद्ध के कारण खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है। हाल ही में बहरीन और यूएई के बड़े एल्युमिनियम प्लांट्स को काफी क्षति पहुँची है।