1955 का परमाणु सपना और 2026 की AI क्रांति: क्या भारत इस बार 'Tech Race' में बाजी मार लेगा?
इतिहास का शंखनाद और दिल्ली का नया दौर
तारीख 8 अगस्त, 1955। जेनेवा के पैलेस ऑफ नेशन्स में दुनिया भर के वैज्ञानिक और कूटनीतिज्ञ जुटे थे। मौका था परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर पहला वैश्विक सम्मेलन और अध्यक्षता कर रहे थे भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी जे. भाभा। भाभा ने तब एक सपना देखा था—कि परमाणु ऊर्जा विकासशील देशों के लिए 'गरीबी के अंधेरे' को दूर करने वाली रोशनी बनेगी। आज ठीक 71 साल बाद, दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित 'भारत मंडपम' से एक बार फिर वैसा ही शंखनाद सुनाई दे रहा है। लेकिन इस बार विषय परमाणु विखंडन नहीं, बल्कि 'डिजिटल न्यूरॉन्स' यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) है।
साल 2026 का 'इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट' (India AI Impact Summit) केवल एक तकनीकी प्रदर्शनी नहीं है; यह भारत के भविष्य का वह खाका है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'नई बिजली' का नाम दे रहे हैं। जिस तरह पिछली सदी में बिजली और परमाणु ऊर्जा ने राष्ट्रों की ताकत तय की थी, आज एआई वही भूमिका निभा रहा है। दिल्ली की सड़कों पर सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच 20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों का जमावड़ा है—फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन, ब्राजील के लूला डी सिल्वा, स्पेन के पेड्रो सांचेज़ और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान इस बात का सबूत हैं कि भारत अब दुनिया की 'टेक कूटनीति' का केंद्र बन चुका है।
यहाँ भारत मंडपम के गलियारों में केवल नीतिगत चर्चाएं ही नहीं हो रही हैं, बल्कि तकनीकी दुनिया के बेताज बादशाह जैसे सैम ऑल्टमैन, सुंदर पिचाई और डारियो अमोदेई भी भविष्य की 'एल्गोरिदम' लिख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या 1955 में भाभा ने जो परमाणु सपना देखा था, जिसे बाद के दशकों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबावों ने धुंधला कर दिया था, क्या हम 2026 की इस एआई रेस में उस इतिहास से सीखकर बाजी मार पाएंगे?
"भाभा प्लेबुक" और भारत की नई टेक डिप्लोमेसी
आज भारत जिस कूटनीतिक पथ पर चल रहा है, उसे वरिष्ठ विश्लेषक सी. राजा मोहन "भाभा प्लेबुक" का आधुनिक संस्करण कहते हैं। 1955 में भाभा जानते थे कि शीत युद्ध के दो ध्रुवों—अमेरिका और सोवियत संघ—के बीच फंसे बिना तकनीक हासिल करना एक बड़ी दांव-पेच वाली चुनौती थी। आज वैसी ही स्थिति अमेरिका और चीन के बीच के 'टेक कोल्ड वॉर' की है।
भारत यहाँ एक 'ब्रिज-बिल्डर' (सेतु निर्माता) की भूमिका में है। हम एक तरफ सिलिकॉन वैली के साथ गहरे रिश्ते बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ 'ग्लोबल साउथ' के नेतृत्व का दावा भी कर रहे हैं। 1950 के दशक में भाभा ने पश्चिमी देशों के साथ जो वैज्ञानिक संबंध बनाए थे, उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी थी। आज वही कहानी दोहराई जा रही है, जहाँ अमेरिकी टेक कंपनियाँ भारत में अपने रिसर्च सेंटर खोल रही हैं और भारतीय इंजीनियर ग्लोबल एआई इकोसिस्टम की रीढ़ बने हुए हैं।
"केवल वे जो राष्ट्रीय क्षमता का निर्माण करते हैं, वे ही वैश्विक व्यवस्था को सार्थक रूप से आकार दे सकते हैं।" — सी. राजा मोहन
राजा मोहन का यह तर्क आज के भारत पर सटीक बैठता है। 1970 के दशक में भारत परमाणु क्षेत्र में अलग-थलग पड़ गया था क्योंकि हमने घरेलू क्षमता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के बीच संतुलन खो दिया था। 2026 का भारत इस गलती को दोहराना नहीं चाहता। आज हमारी रणनीति केवल एआई 'इस्तेमाल' करने की नहीं, बल्कि एआई के वैश्विक नियमों को 'बनाने' की है।
US-China की खींचतान और मोदी का 'Reset' बटन
अगर हम एक साल पीछे मुड़कर देखें, तो 2025 भारत के लिए कूटनीतिक जद्दोजहद वाला साल था। सीमा पर संघर्ष और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े व्यापारिक शुल्कों (Tariffs) ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बना दिया था। ट्रंप ने तब भारतीय सामानों पर 50% तक शुल्क लगाने की धमकी दी थी। लेकिन 2026 की शुरुआत एक रणनीतिक 'Reset' के साथ हुई है।
प्रधानमंत्री मोदी की हालिया कूटनीतिक सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने भारतीय सामानों पर शुल्क को 50% से घटाकर 18% कर दिया है। यह केवल एक आर्थिक रियायत नहीं है, बल्कि इस बात की स्वीकारोक्ति है कि अमेरिका को चीन के मुकाबले भारत जैसा एक मजबूत और विश्वसनीय साझीदार चाहिए। चीन का बाजार आज अमेरिकी बिग टेक कंपनियों के लिए लगभग बंद है, और यही भारत के लिए "Sweet Spot" है।
इसी का नतीजा है कि अमेज़न और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने भारत में $50 बिलियन के भारी-भरकम निवेश का एलान किया है। इस $50 बिलियन का मतलब केवल कागजी आंकड़े नहीं हैं; इसका सीधा अर्थ है भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में डेटा सेंटर्स का जाल, स्थानीय स्टार्टअप्स के लिए क्लाउड कंप्यूटिंग की सस्ती सुविधा और लाखों नए रोजगार। यह निवेश भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में चीन के वास्तविक विकल्प के रूप में खड़ा कर रहा है।
हेल्थकेयर में एआई की 'साही' (SAHI) शुरुआत: आम आदमी को क्या मिला?
अक्सर तकनीकी शिखर सम्मेलनों में होने वाली बातें आम आदमी के सिर के ऊपर से निकल जाती हैं, लेकिन इस बार स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा द्वारा घोषित SAHI (Strategy for AI in Healthcare for India) और BODH (Benchmarking Open Data Platform) सीधे 'आम नागरिक की चौखट' से जुड़ी हैं।
भारत जैसे देश में, जहाँ डॉक्टर और मरीज का अनुपात हमेशा एक चुनौती रहा है, एआई एक 'डिजिटल मसीहा' बन सकता है। SAHI का लक्ष्य एआई को केवल बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों तक सीमित रखना नहीं, बल्कि इसे जिला अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुँचाना है। वहीं BODH प्लेटफॉर्म, जिसे आईआईटी कानपुर और नेशनल हेल्थ अथॉरिटी ने विकसित किया है, स्वास्थ्य डेटा की गोपनीयता (Privacy) और सटीकता के बीच एक मजबूत दीवार खड़ा करता है।
कल्पना कीजिए कि एक ग्रामीण इलाके का डॉक्टर एआई की मदद से किसी बीमारी का सटीक निदान कर सके, वह भी मरीज के डेटा को लीक किए बिना। यह "Public Health Priorities" यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को तकनीक के साथ जोड़ने का भारत का अपना अनूठा मॉडल है।
सरकारी बाबू अब खोजेंगे 'AI Apps': फाइलों से भविष्य की ओर
दिल्ली की सत्ता के गलियारों यानी कैबिनेट सचिवालय से निकला एक हालिया ज्ञापन (Memorandum) चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार ने आदेश दिया है कि डिप्टी सेक्रेटरी और उससे ऊपर के हर अधिकारी को अब "Tech Scout" बनना होगा। इन अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे भारत मंडपम के स्टालों पर जाकर केवल 'लंच' न करें, बल्कि यह खोजें कि उनके विभाग में एआई का क्या व्यावहारिक उपयोग (Practical Application) हो सकता है।
हर अधिकारी को दो पन्नों का एक नोट सौंपना है कि कैसे एक विशेष एआई ऐप उनके विभाग की फाइलों की सुस्ती दूर कर सकता है या नागरिक सेवाओं को बेहतर बना सकता है। यह भारतीय नौकरशाही के लिए एक बड़ा सांस्कृतिक बदलाव है। जो अधिकारी कल तक 'रेड टेप' यानी लालफीताशाही के लिए जाने जाते थे, उन्हें अब 'सिलिकॉन रिबन' से गवर्नेंस को बांधने का जिम्मा सौंपा गया है। यह "Top-Down" एप्रोच बताती है कि सरकार एआई को केवल निजी क्षेत्र का खिलौना नहीं, बल्कि सुशासन का औजार बनाना चाहती है।
'Physical AI' और रोजगार की चिंता: टीसीएस का कुत्ता और गिरते शेयर
शिखर सम्मेलन में टीसीएस (TCS) का "रोबोट डॉग" (Quadruped Machine) सबका ध्यान खींच रहा है। यह मशीन मलबे में चल सकती है, सीढ़ियां चढ़ सकती है और मशीनी खराबी को सूंघकर पहचान सकती है। इसे 'Physical AI' कहा जा रहा है। एक तरफ यह आपदा प्रबंधन में वरदान है, लेकिन दूसरी तरफ यह एक डरावना संकेत भी है।
बाजार में एक अजीब सी बेचैनी है। इंफोसिस और टीसीएस जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयर निवेशकों की पसंद से बाहर हो रहे हैं। निवेशकों को डर है कि एआई कहीं भारत के पारंपरिक 'आईटी आउटसोर्सिंग मॉडल' की जड़ें न काट दे। अगर कोडिंग और टेस्टिंग एआई ही कर लेगा, तो उन लाखों युवाओं का क्या होगा जो हर साल आईटी इंजीनियर बनकर निकलते हैं?
एक वरिष्ठ संपादक के नाते मेरा विश्लेषण यह है कि भारत यहाँ दोराहे पर खड़ा है। एक ओर हम 'रोबोटिक डॉग' जैसी प्रगति पर गर्व कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी विशाल श्रम शक्ति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं। सरकार को यह समझना होगा कि एआई केवल उत्पादकता बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि नए तरह के रोजगार पैदा करने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, वरना यह तकनीकी क्रांति एक सामाजिक असंतोष का कारण बन सकती है।
यह भी पढ़ें:- मुंबई में मोदी-मैक्रों मुलाकात: $35B राफेल डील और AI 2026 {alertInfo}
ग्लोबल साउथ की आवाज और भारत के 'Sutras'
ताज पैलेस की शाम की महफिल में जब विदेशी मेहमान 'ढींगरी कचरू', 'सेपू बड़ी' और 'काला मोती गुच्छी पुलाव' जैसे हिमाचली और कश्मीरी व्यंजनों का स्वाद ले रहे थे, तब भारत अपनी 'सॉफ्ट पावर' का लोहा मनवा रहा था। विदेश मंत्रालय ने इस समिट के लिए तीन 'Sutras' दिए हैं: 'People, Planet, and Progress'।
भारत यहाँ खुद को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि 'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में पेश कर रहा है। हमारा संदेश साफ है—अगर एआई का कोई मॉडल भारत की विविधता और जटिलता में सफल हो सकता है, तो वह अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व के लिए भी सबसे सटीक है। यह "प्रौद्योगिकी के माध्यम से कूटनीति" का नया दौर है।
सोशल इक्विटी और 'AI by HER'
सुषमा स्वराज भवन में आयोजित "AI by HER: Global Impact Challenge" इस समिट का वह मानवीय चेहरा है, जिसकी अक्सर तकनीक की दुनिया में कमी खलती है। यहाँ चर्चा केवल जीपीयू (GPU) और चिप्स की नहीं हुई, बल्कि 'सामाजिक समानता' (Social Equity) की हुई। यह कार्यक्रम उन महिला स्टार्टअप संस्थापकों और शोधकर्ताओं को समर्पित है जो एआई क्रांति को समावेशी बना रही हैं। भारत का मानना है कि एआई का विकास केवल मुट्ठी भर 'एलीट' पुरुषों के हाथों में नहीं रहना चाहिए।
यह भी पढ़ें:- JEE Main 2026 Result Analysis: स्कोर, परसेंटाइल और आगे की रणनीति {alertInfo}
निष्कर्ष: 1955 का सपना और 2026 की हकीकत
1955 में होमी भाभा का परमाणु सपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भेंट चढ़ गया था। 1970 के दशक तक आते-आते भारत परमाणु तकनीक के मामले में दुनिया से कट गया था। लेकिन 2026 की एआई क्रांति की तस्वीर अलग है। आज भारत रक्षात्मक नहीं है। हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर।
भारत मंडपम में जुटी यह भीड़, विदेशी निवेश की यह बाढ़ और सरकारी तंत्र की यह सक्रियता बताती है कि भारत इस बार 'Tech Race' में केवल भागीदार नहीं, बल्कि उसे लीड करने के लिए तैयार है। हमारे पास डेटा है, प्रतिभा है और सबसे बड़ी बात—एक रणनीतिक दूरदृष्टि है।
एआई अब आने वाले कल की बात नहीं, हमारे आज की हकीकत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह तकनीक हमारे लोकतंत्र को और मजबूत करेगी या नई चुनौतियां खड़ी करेगी।
अंत में एक सवाल आपके लिए: "क्या आपको लगता है कि AI आने वाले समय में आपके काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देगा या यह केवल एक बड़ा प्रचार (Hype) है?"
आप इस मुद्दे को कैसे देखते हैं? अपने विचार साझा करें।
{getButton} $text={स्रोत-1} $icon={link} $color={#5cbe13} {getButton} $text={स्रोत-2} $icon={link} $color={#5cbe13} {getButton} $text={स्रोत-3} $icon={link} $color={#5cbe13} {getButton} $text={स्रोत-4} $icon={link} $color={#5cbe13}
FAQs: 1955 परमाणु सपना और 2026 AI क्रांति से जुड़े सवाल
1955 के परमाणु सम्मेलन का भारत के लिए क्या महत्व था?
1955 में जेनेवा में हुए परमाणु ऊर्जा सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. होमी जे. भाभा ने की थी। उनका सपना था कि परमाणु ऊर्जा विकासशील देशों की गरीबी दूर करने का साधन बने। यह भारत की वैज्ञानिक कूटनीति की शुरुआती नींव थी।
India AI Impact Summit 2026 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 का लक्ष्य भारत को वैश्विक AI केंद्र के रूप में स्थापित करना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना और AI के सामाजिक, स्वास्थ्य, कृषि व ऊर्जा क्षेत्रों में व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा देना है।
क्या भारत US-China Tech Race में संतुलन बना पा रहा है?
भारत एक “ब्रिज-बिल्डर” की भूमिका निभा रहा है। वह अमेरिका के साथ तकनीकी साझेदारी बढ़ाते हुए ग्लोबल साउथ का नेतृत्व भी कर रहा है, ताकि AI के वैश्विक नियमों के निर्माण में उसकी निर्णायक भूमिका हो।
AI क्रांति से भारत में रोजगार पर क्या असर पड़ेगा?
AI पारंपरिक IT आउटसोर्सिंग मॉडल को बदल सकता है, जिससे कुछ नौकरियों पर असर पड़ सकता है। लेकिन साथ ही डेटा साइंस, AI डेवलपमेंट, साइबर सुरक्षा और ऑटोमेशन जैसे नए क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
{alertSuccess}‘SAHI’ और ‘BODH’ पहल आम नागरिकों के लिए कैसे फायदेमंद हैं?
SAHI (Strategy for AI in Healthcare for India) और BODH (Benchmarking Open Data Platform) स्वास्थ्य सेवाओं में AI के सुरक्षित और नैतिक उपयोग को बढ़ावा देती हैं, जिससे ग्रामीण और जिला स्तर तक बेहतर और सटीक इलाज संभव हो सकेगा।

