हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच संपन्न हुआ 'अंतरिम व्यापार समझौता ढांचा' (Interim Trade Pact Framework) वैश्विक भू-राजनीति में एक युगांतकारी मोड़ है। महीनों के तनाव और कूटनीतिक रस्साकशी के बाद, नई दिल्ली ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म संतुलन साधा है। इस सौदे की आधारशिला रूस से तेल आयात को पूरी तरह बंद करने की भारत की प्रतिबद्धता है, जिसके बदले में अमेरिका ने अगस्त 2025 में लगाए गए 25% के दंडात्मक टैरिफ (Penal Tariff) को हटाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। यह समझौता केवल व्यापारिक आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि भारत के 140 करोड़ नागरिकों की खाद्य सुरक्षा और करोड़ों सीमांत किसानों के भविष्य को सुरक्षित करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
रूसी तेल का परित्याग और टैरिफ की रणनीतिक बढ़त
इस व्यापारिक सौदे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत द्वारा अपनी ऊर्जा निर्भरता को रूस से हटाकर अमेरिका की ओर मोड़ना है। भारत ने प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों रूपों में रूसी तेल का आयात बंद करने का वादा किया है। इसके प्रतिफल के रूप में, अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर लगे अतिरिक्त करों के बोझ को कम किया है।
विशेष रूप से, भारतीय निर्यातकों के लिए यह एक बहुत बड़ा 'प्रतिस्पर्धी लाभ' (Competitive Advantage) है। पिछले वर्ष के अंत तक भारतीय उत्पादों पर प्रभावी टैरिफ 50% के स्तर पर पहुंच गया था—जिसमें 25% 'रेसिप्रोकल टैरिफ' और रूस से तेल खरीद के कारण लगा 25% 'पैनल टैरिफ' शामिल था। अब, इस नए समझौते के तहत, भारत के लिए टैरिफ को घटाकर 18% के प्रभावी स्तर पर लाया गया है। यह 'मोस्ट फेवर्ड नेशन-प्लस' (MFN-plus) जैसी स्थिति है, क्योंकि भारत के क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों (जैसे वियतनाम या बांग्लादेश) के लिए यह शुल्क 19% से 20% के बीच है। यह 1-2% का अंतर भारतीय इंजीनियरिंग और कपड़ा निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में एक निर्णायक 'हेड-स्टार्ट' प्रदान करेगा।
"भारत ने रूसी संघ से तेल का आयात सीधे या परोक्ष रूप से बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है... इसके प्रभावी होने के साथ ही, 7 फरवरी, 2026 की सुबह 12:01 बजे (पूर्वी मानक समय) से भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त मूल्य आधारित शुल्क (ad valorem rate) अब लागू नहीं होगा।" - व्हाइट हाउस कार्यकारी आदेश
भारतीय कृषि और डेयरी का अभेद्य 'सुरक्षा कवच'
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारत ने वार्ता के दौरान कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कोई भी समझौता न करने का कड़ा रुख अपनाया। भारत ने एक व्यापक 'नेगेटिव लिस्ट' (Negative List) के माध्यम से अपनी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा है। इस समझौते के पहले चरण (First Tranche) से निम्नलिखित वस्तुओं को पूरी तरह बाहर रखा गया है:
- खाद्यान्न और चारा: चावल, गेहूं, अन्य अनाज, आटा (Atta) और पशु आहार (Animal Feed)।
- डेयरी और पोल्ट्री: सभी डेयरी उत्पाद, चिकन और मीट।
- अन्य संवेदनशील फसलें: सोयामील, मक्का (Maize), कोपरा (Copra), तंबाकू, चाय और फूल।
- सब्जियां: आलू, प्याज और लहसुन।
भारत ने स्पष्ट किया है कि चूंकि भारतीय कृषि मुख्य रूप से 'जीवन निर्वाह खेती' (Subsistence farming) और छोटी जोत पर आधारित है, इसलिए इन क्षेत्रों में सीमित रियायत देना भी घरेलू किसानों के लिए विनाशकारी होता।
GM फूड और अमेरिकी मक्के पर कड़ा प्रतिरोध
इस व्यापार ढांचे में भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified - GM) भोजन के प्रवेश को रोकना है। अमेरिकी पक्ष ने अपने मक्के (Corn) के लिए भारतीय बाजार खोलने पर भारी दबाव डाला था। हालांकि, भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि अमेरिकी मक्के को अनुमति देने का अर्थ था भारत में 'जीएम फूड' के लिए पिछले दरवाजे से रास्ता खोलना। इसके अलावा, अमेरिका ने इथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol blending) के माध्यम से बाजार पहुंच चाही थी, जिसे भारत ने अपने गन्ना किसानों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए अस्वीकार कर दिया।
$500 बिलियन का भविष्योन्मुखी रोडमैप
यह समझौता केवल मौजूदा बाधाओं को दूर करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अगले पांच वर्षों के लिए एक महत्वाकांक्षी द्विपक्षीय व्यापार ब्लूप्रिंट है। भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से $500 बिलियन मूल्य के उत्पादों और सेवाओं की खरीद का रोडमैप तैयार किया है, जिसमें शामिल हैं:
- ऊर्जा और संसाधन: अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद और कोकिंग कोल (Coking Coal)।
- विमानन: अमेरिकी विमान और उनके पुर्जों की बड़े पैमाने पर खरीद।
- रणनीतिक संपत्तियां: बहुमूल्य धातुएं (Precious Metals) और उच्च-तकनीकी उत्पाद।
- रक्षा: अगले 10 वर्षों के लिए रक्षा सहयोग के विस्तार का एक नया ढांचा।
यह विशाल निवेश न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को रूस से अमेरिका की ओर स्थानांतरित करता है, बल्कि दोनों देशों के बीच एक 'लॉन्ग-टर्म' रणनीतिक निर्भरता भी पैदा करता है।
कैलिब्रेटेड ओपनिंग: घरेलू बाजार की रक्षा
जहां भारत ने बुनियादी कृषि को सुरक्षित रखा है, वहीं कुछ गैर-संवेदनशील क्षेत्रों में 'कैलिब्रेटेड' (नपी-तुली) पहुंच प्रदान की है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिकी सेबों के लिए कोटा-आधारित व्यवस्था अपनाई गई है, जैसा कि भारत ने पूर्व में यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ किया था। इसमें 'लॉन्ग फेजिंग पीरियड' (Long Phasing Period) का प्रावधान रखा गया है, ताकि आयात शुल्क में कटौती धीरे-धीरे हो और घरेलू उत्पादकों को तैयारी का पर्याप्त समय मिले।
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निष्कर्ष: रणनीतिक लाभ या भविष्य का जोखिम?
भारत-अमेरिका का यह अंतरिम व्यापार समझौता एक 'रणनीतिक बढ़त' (Strategic Edge) का दस्तावेज है। भारत ने अपने निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार के द्वार फिर से खोल दिए हैं और रूस के साथ तेल व्यापार से उत्पन्न होने वाले दंडात्मक झटकों को समाप्त कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत ने अपनी 'थाली' और 'खेती' को वैश्विक व्यापार की वेदी पर बलि नहीं चढ़ने दिया।
हालांकि, एक बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है— "क्या रूसी ऊर्जा के सस्ते और भरोसेमंद विकल्प को त्याग कर अमेरिका के साथ यह रणनीतिक निर्भरता भारत को वह दीर्घकालिक स्थिरता दे पाएगी जिसकी उसे तलाश है, या भविष्य के व्यापारिक चरणों में भारत पर अपनी कृषि सुरक्षा को ढीला करने का दबाव फिर से बनाया जाएगा?"

