ऊर्जा का नया 'शीत युद्ध': भारत, रूस और अमेरिका के बीच छिड़े तेल संघर्ष के 5 बड़े खुलासे

आज के वैश्विक परिदृश्य में, तेल केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि संप्रभुता और कूटनीतिक दबाव का सबसे शक्तिशाली हथियार बन चुका है। फरवरी 2026 के इस दौर में, जब दुनिया रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान की उम्मीद कर रही थी, ऊर्जा बाजार महाशक्तियों के 'ईगो' और रणनीतिक वर्चस्व की एक नई युद्धभूमि बन गया है। भारत, जो लंबे समय से इस भू-राजनीतिक बिसात पर अपनी 'तटस्थ' स्थिति और 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है, अब एक ऐसी जटिल पहेली के केंद्र में है जहां एक तरफ अमेरिका का 'ट्रेड डील' वाला प्रलोभन है और दूसरी तरफ रूस का सस्ता तेल। क्या ऊर्जा की कीमतें अब मुक्त बाजार के सिद्धांतों के बजाय वाशिंगटन और मास्को की कूटनीतिक चालों से तय होंगी? एक विशेषज्ञ के रूप में, मैं इस ऊर्जा संघर्ष के उन पांच बड़े पहलुओं का विश्लेषण कर रहा हूँ जो वैश्विक व्यवस्था को नया आकार दे रहे हैं।

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1. "टैंकरों के खिलाफ युद्ध": अंतरराष्ट्रीय कानून और लावरोव का प्रहार

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में अमेरिका पर "खुले समुद्र में टैंकरों के खिलाफ युद्ध" छेड़ने का सीधा आरोप लगाया है। यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के उल्लंघन का एक गंभीर दावा है। लावरोव का तर्क है कि अमेरिका अपनी आर्थिक श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए 'कोर्सिव' (दबावकारी) नीतियों का सहारा ले रहा है। रूस खुद को अंतरराष्ट्रीय कानून के रक्षक के रूप में पेश कर रहा है, जबकि वाशिंगटन पर आरोप लगा रहा है कि वह भारतीय भागीदारों को डराकर उन्हें महंगा अमेरिकी एलएनजी (LNG) खरीदने के लिए मजबूर कर रहा है।

लावरोव ने वैश्विक मंच पर अपनी नाराजगी इन शब्दों में व्यक्त की:

"वे (अमेरिका) भारत और हमारे अन्य भागीदारों को सस्ते रूसी ऊर्जा संसाधनों को खरीदने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं... और उन्हें अत्यधिक कीमतों पर अमेरिकी एलएनजी खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं।"

2. अलास्का शिखर सम्मेलन का 'रहस्य' और 'सूचनात्मक युद्ध'

अगस्त 2025 के अलास्का शिखर सम्मेलन को लेकर रूस अब एक नए 'नैरेटिव' का खेल (Information Warfare) खेल रहा है। क्रेमलिन का दावा है कि पुतिन और ट्रंप के बीच यूक्रेन मुद्दे पर एक समझौता "लगभग तय" हो गया था, जिसे अब अमेरिका ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। हालांकि, 'इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर' (ISW) का सूक्ष्म विश्लेषण कुछ और ही कहानी बयां करता है।

ISW के अनुसार, रूस सार्वजनिक दस्तावेजों की कमी का लाभ उठाकर यह भ्रम पैदा कर रहा है कि अमेरिका ने शांति का मौका गंवा दिया है। वास्तव में, रूस का यह कदम एक सोची-समझी रणनीति है ताकि वह अमेरिका को यूक्रेन और यूरोप के साथ जारी मौजूदा वार्ताओं को छोड़कर, सीधे रूसी शर्तों पर 'आत्मसमर्पण' (Capitulation) आधारित समझौते के लिए मजबूर कर सके। यह शुद्ध रूप से एक कूटनीतिक पैंतरेबाजी है।

3. भारत के लिए 'गाजर और छड़ी' (Carrot and Stick) की नीति

अमेरिका ने भारत को रूसी तेल से दूर करने के लिए 'गाजर और छड़ी' की एक क्लासिक कूटनीतिक रणनीति अपनाई है।

  • गाजर (प्रलोभन): अमेरिका ने नए 'ट्रेड डील' के तहत भारतीय सामानों पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया है। यह भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए एक बड़ी जीत है।
  • छड़ी (दबाव): दूसरी ओर, 'Aquila II' जैसे रूसी शैडो फ्लीट टैंकरों की अमेरिकी जब्ती ने यह संदेश दिया है कि प्रतिबंधों का उल्लंघन महंगा पड़ेगा।

इस दबाव के बीच, भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 'रणनीतिक स्वायत्तता' का परिचय देते हुए स्पष्ट किया है कि 1.4 अरब भारतीयों के लिए 'ऊर्जा सुरक्षा' सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत का यह रुख दर्शाता है कि वह किसी भी महाशक्ति के दबाव में आए बिना अपनी जरूरतों के अनुसार ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण (Diversification) जारी रखेगा।

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4. जमीनी हकीकत: भारतीय रिफाइनरियों का तकनीकी संकोच

रॉयटर्स की हालिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि भारतीय रिफाइनरियों (जैसे Indian Oil और Reliance) ने अप्रैल 2026 के लिए रूसी तेल के ऑर्डर देने में सावधानी बरतना शुरू कर दिया है। यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि परिचालन जोखिम (Operational Risk) से जुड़ा है। 'Aquila II' की जब्ती के बाद शिपिंग और भुगतान से जुड़ी अनिश्चितताओं ने भारतीय रिफाइनर्स के बीच डर पैदा कर दिया है।

यहाँ एक तकनीकी बारीकी पर ध्यान देना आवश्यक है: रूसी समर्थित 'नायरा एनर्जी' (Nayara Energy), जो मुख्य रूप से रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है, ने भी अप्रैल 2026 के लिए आयात कम किया है। हालांकि, इसका एक बड़ा कारण 'मेंटेनेंस शटडाउन' (रखरखाव के लिए संयंत्र बंद होना) भी है। यह दर्शाता है कि ऊर्जा बाजार की तस्वीर जितनी राजनीतिक है, उतनी ही तकनीकी भी।

5. ब्रिक्स (BRICS) और 'वित्तीय संप्रभुता' की जंग

सर्गेई लावरोव के लिए यह संघर्ष अब केवल तेल की बिक्री तक सीमित नहीं है। वह इसे अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व के खिलाफ एक बड़ी जंग के रूप में देख रहे हैं। लावरोव ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका डॉलर और प्रतिबंधों को 'आर्थिक प्रभुत्व' के हथियार के रूप में उपयोग कर रहा है, जिससे भविष्य में अमेरिका-रूस आर्थिक संबंधों की कोई "उज्ज्वल संभावना" नहीं बची है।

रूस अब ब्रिक्स के भीतर 'डी-डलराइजेशन' (De-dollarization) और 'वित्तीय संप्रभुता' (Financial Sovereignty) पर जोर दे रहा है। भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों के साथ मिलकर रूस ऐसी वैकल्पिक वित्तीय और लॉजिस्टिक प्रणालियां बनाना चाहता है जो अमेरिकी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हों।

निष्कर्ष: एक अनिश्चित भविष्य

ऊर्जा का यह नया शीत युद्ध अब अपने निर्णायक मोड़ पर है। जहां एक ओर अमेरिका अपने व्यापारिक समझौतों के जरिए भारत को पश्चिम की ओर खींच रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भारत की ऊर्जा जरूरतों का सहारा ले रहा है। भारत ने अब तक कुशलतापूर्वक संतुलन बनाए रखा है, लेकिन अप्रैल 2026 के बाद की स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाली है।

आज का सबसे गंभीर सवाल यही है: क्या भारत अमेरिकी प्रलोभनों और रूसी ऊर्जा लाभों के बीच अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को अक्षुण्ण रख पाएगा, या अंततः उसे किसी एक पक्ष के पाले में खड़े होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा?

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