वैश्विक भू-राजनीतिक बिसात पर इस समय मस्कट (ओमान) सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता का माहौल है—सोने की कीमतों में उछाल और इक्विटी बाजारों में गिरावट इस तनाव की स्पष्ट गवाही दे रहे हैं—वहीं दूसरी ओर ईरान और अमेरिका के बीच मस्कट में हुई 'हाई-स्टेक' वार्ता ने दुनिया को एक चौराहे पर खड़ा कर दिया है। यह कूटनीतिक हलचल उस पृष्ठभूमि में हो रही है जहाँ पिछले साल जून में हुए 12 दिवसीय युद्ध के दौरान अमेरिका और इजरायल ने ईरानी परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी। क्या कूटनीति इस बार संघर्ष पर हावी होगी? ओमान वार्ता के ये 5 निष्कर्ष वर्तमान स्थिति की जटिलता को उजागर करते हैं।
1. कूटनीति के साथ तेल प्रतिबंध: एक रणनीतिक विरोधाभास
मस्कट में वार्ता की मेज पर चर्चा अभी समाप्त ही हुई थी कि वाशिंगटन ने ईरान पर नए तेल प्रतिबंधों की घोषणा करके सबको चौंका दिया। यह कदम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि 'दबाव की राजनीति' (Pressure Tactics) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जहां वार्ता के माहौल को 'सकारात्मक' बताया, वहीं अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि बातचीत का अर्थ रियायत नहीं है।
अब्बास अराघची ने 'X' पर अपनी प्रतिक्रिया में ईरान के संशय और सतर्कता को स्पष्ट किया:
"ईरान खुली आँखों और पिछले एक साल की स्थिर स्मृति के साथ कूटनीति में प्रवेश करता है। वादों का सम्मान किया जाना चाहिए। समान स्तर, पारस्परिक सम्मान और साझा हित केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि एक टिकाऊ समझौते के आधार स्तंभ हैं।"
विश्लेषकों के लिए यह स्पष्ट है कि प्रतिबंधों की यह टाइमिंग वार्ता की मेज पर अमेरिका की सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) को अधिकतम करने की एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है।
2. "शून्य परमाणु क्षमता" और रूबियो की विस्तारित मांगें
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का रुख इस बार पहले से कहीं अधिक कड़ा है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया है कि ट्रंप की मांग "शून्य परमाणु क्षमता" (Zero Nuclear Capacity) से कम कुछ भी नहीं है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कूटनीतिक दायरे को बढ़ाते हुए इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों और ईरान के अपने नागरिकों के साथ किए जा रहे व्यवहार को भी शामिल करने की शर्त रखी है।
इस वार्ता में स्टीव विटकॉफ के साथ जेरेड कुशनर की उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो ट्रंप प्रशासन की विशिष्ट और सीधी कूटनीतिक शैली का संकेत देती है। यह टीम केवल 2015 के परमाणु समझौते की कमियों (जैसे कि समय-सीमित प्रतिबंध) को दूर नहीं करना चाहती, बल्कि एक नया और अधिक व्यापक ढांचा तैयार करने के पक्ष में है।
3. "आक्रामक सिद्धांत" और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन
ईरान ने अमेरिका के दबाव का उत्तर अपने सैन्य सिद्धांत में मूलभूत बदलाव के साथ दिया है। जून के युद्ध में अपने परमाणु ठिकानों पर हुए हमलों के अनुभव से सीख लेते हुए, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अपनी रक्षात्मक नीति को "आक्रामक सिद्धांत" (Offensive Doctrine) में बदल दिया है।
इस शक्ति-प्रदर्शन के साक्ष्य वार्ता से कुछ घंटे पहले ही मिल गए:
- ईरान ने अपनी सबसे उन्नत लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल 'खुर्रमशहर-4' (Khorramshahr-4) की तैनाती की घोषणा की।
- इन मिसाइलों को ईरान के विशाल भूमिगत 'मिसाइल शहरों' में युद्ध के लिए तैयार स्थिति में रखा गया है।
यह दर्शाता है कि तेहरान अब केवल रक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि किसी भी हमले का आक्रामक जवाब देने की क्षमता विकसित कर चुका है।
4. मस्कट का चुनाव और 'अनाक्रमण समझौता'
वार्ता के स्थान को इस्तांबुल से मस्कट (ओमान) स्थानांतरित करना एक महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम था। हालांकि इस बदलाव ने शुरुआत में वाशिंगटन को नाराज किया और वार्ता रद्द होने की अटकलें लगाई गईं, लेकिन अंततः ओमान की विश्वसनीय मध्यस्थता की भूमिका को स्वीकार किया गया। इस दौरान क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक 'अनाक्रमण समझौते' (Non-Aggression Agreement) का प्रस्ताव भी सामने आया है।
इस शांति पहल और ढांचे को तैयार करने में निम्नलिखित देश रुचि दिखा रहे हैं:
- सऊदी अरब, कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और पाकिस्तान।
यह समझौता एक ऐसा ढांचा है जिसमें ईरान और अमेरिका एक-दूसरे पर हमला न करने की कसम खाएंगे। हालांकि, क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते में इजरायल की भागीदारी सुनिश्चित करना सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
5. घरेलू अशांति और अमेरिकी 'आर्मडा' का दबाव
ईरान की सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। ईरान के भीतर हालिया राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोगों की मृत्यु ने शासन को रक्षात्मक स्थिति में डाल दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने इस आंतरिक असंतोष को हथियार बनाते हुए प्रदर्शनकारियों को संदेश दिया कि "मदद रास्ते में है।"
इसके साथ ही, खाड़ी में अमेरिकी नौसैनिक बेड़े (Aircraft Carrier Group) की तैनाती, जिसे ट्रंप बार-बार 'आर्मडा' (Armada) कह रहे हैं, ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रही है। ट्रंप का हालिया बयान इस रणनीति को उजागर करता है:
"वे नहीं चाहते कि हम उन पर हमला करें, हमारे पास वहां एक बड़ा बेड़ा (Armada) जा रहा है। वे बातचीत कर रहे हैं।"
यह स्पष्ट है कि आंतरिक विद्रोह और बाहरी सैन्य खतरे के दोहरे दबाव ने ही तेहरान को बातचीत की मेज पर बैठने के लिए मजबूर किया है।
भविष्य की राह
ओमान वार्ता का यह दौर समाप्त हो चुका है, लेकिन परिणाम अभी भी भविष्य की गर्त में हैं। ईरान ने स्पष्ट किया है कि "आगे का रास्ता अब राजधानियों (तेहरान और वाशिंगटन) के साथ होने वाले परामर्शों पर निर्भर करेगा।" कूटनीति के द्वार खुले तो हैं, लेकिन विश्वास की कमी और सैन्य तैनाती की आक्रामकता किसी भी क्षण संतुलन बिगाड़ सकती है।
अब दुनिया के सामने एक मौलिक प्रश्न खड़ा है: क्या यह कूटनीति की एक नई सुबह है या केवल एक बड़े भीषण तूफान से पहले की खामोशी?

