असम में मोदी का ‘महा-लैंडिंग’: हाईवे पर उतरे विमान और कांग्रेस पर तीखे वार – 5 बड़े संकेत जो पूर्वोत्तर की तस्वीर बदल देंगे

14 फरवरी 2026 की वह सुबह। डिब्रूगढ़ के मोरान में नेशनल हाईवे पर पसरा सन्नाटा अचानक आसमान से आती एक गूंज से टूट गया। दूर क्षितिज पर नारंगी आभा के बीच एक विशालकाय परछाईं दिखाई दी। जैसे-जैसे वह करीब आई, भारतीय वायुसेना के ‘C-130J सुपर हरक्यूलिस’ विमान की गर्जना ने जमीन को थरथरा दिया। चाबुआ एयरफील्ड से उड़ान भरने वाले इस महाबली विमान ने जब मोरान के हाईवे बाईपास पर अपने पहिए टिकाए, तो टायरों से उड़ती धूल ने इतिहास की एक नई इबारत लिख दी।

यह कोई आपातकालीन लैंडिंग नहीं थी, बल्कि ‘नए भारत’ की सामरिक शक्ति का सजीव प्रदर्शन था। विमान के रुकते ही जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्कुराते हुए बाहर निकले, तो उनके स्वागत के लिए वहां असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए. पी. सिंह मौजूद थे। यह ‘महा-लैंडिंग’ केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का उद्घाटन नहीं थी; यह दिल्ली की सत्ता का पूर्वोत्तर के प्रति उस अटूट प्रेम और प्रतिबद्धता का प्रमाण था, जिसने पिछले एक दशक में इस क्षेत्र की सियासी और भौगोलिक तस्वीर बदल दी है।

एक वरिष्ठ पत्रकार के नजरिए से देखें तो यह दौरा केवल फीता काटने तक सीमित नहीं था। यहाँ से प्रधानमंत्री ने एक तरफ सीमा पार बैठे दुश्मनों को अपनी सैन्य शक्ति दिखाई, तो दूसरी तरफ घरेलू राजनीति के अखाड़े में कांग्रेस को विकास और सुरक्षा के मुद्दों पर चारों खाने चित करने की रणनीति भी साफ कर दी।

Kumar Bhaskar Varma Setu across the Brahmaputra

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सामरिक सुरक्षा का नया अध्याय: LAC से महज 300 किमी दूर 'रनवे-हाईवे'

असम के मोरान में जिस ‘इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी’ (ELF) का प्रधानमंत्री ने लोकार्पण किया, वह भारत की रक्षा नीति में एक युगांतकारी मोड़ है। चीन की सीमा (LAC) से इसकी दूरी महज 300 किलोमीटर है। सियासी गलियारों में इसे ‘साइलेंट मैसेज टू बीजिंग’ कहा जा रहा है।

तकनीकी गहराई और रणनीतिक महत्व: एक सामान्य रनवे और हाईवे पर बनी इस लैंडिंग स्ट्रिप में जमीन-आसमान का अंतर होता है। हाईवे को इस तरह मजबूत करना कि वह 40 से 74 टन के विमानों का भार सह सके, इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है। 100 करोड़ रुपये की लागत से बना यह 4.2 किलोमीटर लंबा हिस्सा अब सुखोई-30 MKI और राफेल जैसे लड़ाकू विमानों के लिए एक वैकल्पिक बेस बन चुका है।

उद्घाटन के दौरान जब राफेल और सुखोई ने ‘टच-एंड-गो’ करतब दिखाए, तो संदेश साफ था—युद्ध की स्थिति में अगर मुख्य एयरबेस पर हमला होता है, तो भारत के ये हाईवे ही हमारे ‘अजेय रनवे’ बन जाएंगे। लेकिन यह केवल युद्ध के लिए नहीं है; पूर्वोत्तर जैसे भूकंपीय और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में, जब संचार के साधन टूट जाते हैं, तब ये ELF राहत और बचाव के लिए ‘लाइफलाइन’ साबित होंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में सुरक्षा पर कड़ा संदेश दिया:

"आज का भारत अपनी सीमाओं को केवल सुरक्षित नहीं करता, बल्कि वह इस सामर्थ्य के साथ खड़ा है कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन को उसके घर में घुसकर भी सबक सिखा सकता है।"

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बुनियादी ढांचे का 'ब्रिज गैप': 70 साल बनाम 11 साल का गणित

ब्रह्मपुत्र नदी, जिसे असम का शोक और गौरव दोनों माना जाता है, उसे पार करना कभी किसी बुरे सपने जैसा था। प्रधानमंत्री ने यहाँ एक ऐसा डेटा पेश किया जो कांग्रेस के लिए सियासी तौर पर काफी असहज करने वाला है। उन्होंने बताया कि कांग्रेस ने अपने 70 साल के शासन में ब्रह्मपुत्र पर केवल 3 पुल बनाए, जबकि भाजपा ने पिछले 11 वर्षों में 5 नए पुलों का जाल बिछा दिया है।

इसी कड़ी में प्रधानमंत्री ने ‘कुमार भास्कर वर्मा सेतु’ का उद्घाटन किया। यह पुल गुवाहाटी और उसके आसपास के इलाकों के लिए गेम-चेंजर साबित होने वाला है।

  • कनेक्टिविटी और कॉमर्स: यह पुल केवल दो किनारों को नहीं जोड़ता, बल्कि यह व्यापार (Commerce) और सुविधा (Comfort) का सेतु है।
  • आस्था का पथ: कामाख्या मंदिर जाने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए अब यात्रा सुगम और समय बचाने वाली होगी।
  • आर्थिक प्रभाव: जब ट्रक और मालवाहक वाहन बिना घंटों जाम में फंसे ब्रह्मपुत्र को पार करेंगे, तो असम की जीडीपी में इसका सीधा असर दिखाई देगा।

यह विश्लेषण हमें बताता है कि भाजपा ने पूर्वोत्तर में ‘लुक ईस्ट’ को ‘एक्ट ईस्ट’ में बदलकर कैसे जमीन पर हकीकत बनाई है।

आर्थिक कायाकल्प: 10,000 करोड़ से 50,000 करोड़ की लंबी छलांग

अक्सर दिल्ली की राजनीति में पूर्वोत्तर को ‘फंड की कमी’ का रोना रोते देखा जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने आज जो आंकड़े रखे, वे चौंकाने वाले हैं। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के राज में असम को केंद्रीय टैक्स के हिस्से के तौर पर साल में करीब 10,000 करोड़ रुपये मिलते थे। आज यह राशि बढ़कर 50,000 करोड़ रुपये हो गई है।

विकास का निवेश मॉडल:

  • कुल आवंटन: पिछले 11 वर्षों में असम को विकास कार्यों के लिए 5.50 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई है।
  • जवाबदेही: यह पैसा केवल कागजों पर नहीं, बल्कि गांवों की सड़कों, नए मेडिकल कॉलेजों और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर में दिख रहा है।

प्रधानमंत्री का यह सवाल कि "क्या वह कांग्रेस, जिसने असम को पैसा ही नहीं दिया, वह कभी राज्य का विकास कर सकती थी?" सीधे तौर पर चुनावी विमर्श को ‘काम बनाम भ्रष्टाचार’ की ओर ले जाता है।

Kumar Bhaskar Varma Setu across the Brahmaputra

जागीरोड और सेमीकंडक्टर क्रांति: चाय से चिप्स तक का सफर

असम की पहचान हमेशा से चाय और तेल (Oil & Tea) से रही है, लेकिन प्रधानमंत्री अब असम को ‘हाई-टेक हब’ के रूप में दुनिया के नक्शे पर ला रहे हैं। जागीरोड में लगने वाला नया सेमीकंडक्टर प्लांट इस दिशा में सबसे बड़ा कदम है।

जागीरोड का इतिहास कभी बंद पड़ी पेपर मिलों और औद्योगिक निराशा का था, लेकिन अब यहाँ ‘भविष्य का असम’ आकार ले रहा है। यह प्लांट केवल रोजगार ही नहीं लाएगा, बल्कि असम को ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बना देगा। एक पत्रकार के तौर पर मैं इसे ‘सेमीकंडक्टर डिप्लोमेसी’ कहता हूँ, जहाँ पूर्वोत्तर अब देश के पिछड़े इलाकों में नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक की दौड़ में सबसे आगे खड़ा होगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम राजनीतिक भ्रष्टाचार: पुलवामा की बरसी और तीखे तेवर

14 फरवरी का दिन देश के लिए भावुक होता है। पुलवामा हमले की बरसी पर प्रधानमंत्री ने शहीदों को नमन करते हुए देश को याद दिलाया कि आज भारत की सुरक्षा नीति बदल चुकी है। उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (2025 के पहलगाम हमले के बाद की कार्रवाई) का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे अब भारत हमलों को सहता नहीं, बल्कि जवाब देता है।

कांग्रेस पर हमला: प्रधानमंत्री ने रक्षा सौदों में होने वाले पुराने घोटालों की तुलना आज बन रही सीमावर्ती सड़कों, सुरंगों और पुलों से की। उन्होंने कांग्रेस पर बेहद कड़ा प्रहार करते हुए कहा:

"सत्ता से 10 साल बाहर रहने के बाद कांग्रेस अब और भी अधिक जहरीली हो गई है। उनके नेता न केवल एंटी-इंडिया तत्वों का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि अवैध घुसपैठियों को संरक्षण देकर असम की पहचान मिटाने की साजिश रच रहे हैं।"

यह बयान स्पष्ट संकेत है कि आने वाले चुनावों में ‘पहचान’ (Identity) और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ भाजपा के सबसे बड़े हथियार होंगे। कांग्रेस पर ‘जहरीले बयानों’ का आरोप लगाकर प्रधानमंत्री ने चुनावी बिसात पर अपनी चालें चल दी हैं।

शिक्षा और पर्यावरण: चहुंमुखी विकास का विजन

विकास केवल ईंट-पत्थरों तक सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री ने शिक्षा और आधुनिक परिवहन के क्षेत्र में भी बड़े कदम उठाए:

  1. IIM गुवाहाटी: इसके ट्रांजिट कैंपस का उद्घाटन असम को उच्च शिक्षा का केंद्र बनाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।
  2. ग्रीन ट्रांजिट: 225 इलेक्ट्रिक बसों को हरी झंडी दिखाकर सरकार ने यह संदेश दिया कि विकास टिकाऊ (Sustainable) होना चाहिए।
  3. डेटा सेंटर: आधुनिक अर्थव्यवस्था डेटा पर टिकी है, और असम में डेटा सेंटर का खुलना इसे डिजिटल इंडिया की मुख्यधारा से जोड़ता है।

गहरा विश्लेषण: क्या असम अब भारत का नया 'ग्रोथ इंजन' है?

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो पूर्वोत्तर हमेशा दिल्ली से दूर महसूस करता था। लेकिन आज की ‘महा-लैंडिंग’ यह बताती है कि अब दूरी केवल शारीरिक नहीं रह गई है, बल्कि दिलों और विकास की दूरी भी खत्म हो रही है। प्रधानमंत्री का बूथ कार्यकर्ताओं को संबोधित करना और ‘तीसरी बार वापसी’ का लक्ष्य रखना यह दिखाता है कि भाजपा असम को केवल एक राज्य के तौर पर नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर के विकास के एक मॉडल के तौर पर देख रही है।

असम अब केवल पूर्वोत्तर का ‘प्रवेश द्वार’ नहीं है; यह भारत के आर्थिक और सामरिक भविष्य का नया पावरहाउस है। हाईवे पर विमान की लैंडिंग एक प्रतीक है—कि भारत अपनी रक्षा के लिए सड़कों को रनवे बना सकता है और विकास के लिए असंभव बाधाओं को भी पार कर सकता है।

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निष्कर्ष और भविष्य की राह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा विकास और विरासत के अद्भुत तालमेल का उदाहरण था। जहाँ एक तरफ आधुनिक युद्ध की जरूरतों के लिए ELF बना, वहीं दूसरी तरफ कामाख्या मंदिर के श्रद्धालुओं के लिए पुल। ₹5.50 लाख करोड़ का निवेश और सेमीकंडक्टर जैसी हाई-टेक परियोजनाएं यह साबित करती हैं कि असम की राजनीति अब केवल पहचान के संकट से निकलकर विकास की आकांक्षाओं की ओर बढ़ चुकी है।

चिंतनशील प्रश्न: क्या असम का यह ‘हाईवे-रनवे’ मॉडल और औद्योगिक कायाकल्प पूरे पूर्वोत्तर के लिए एक स्थाई समाधान बनेगा? और क्या विकास की यह लहर अवैध घुसपैठ जैसे पुराने घावों को भरने में सफल होगी?

आप इस मुद्दे को कैसे देखते हैं? क्या बुनियादी ढांचे में यह ऐतिहासिक बदलाव असम की राजनीतिक और सामरिक नियति को हमेशा के लिए बदल देगा? अपनी राय हमारे साथ साझा करें।

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