फरवरी 2026 का यह बजट सत्र भारतीय संसदीय इतिहास में एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रहा है, जहाँ विमर्श की जगह गतिरोध ने और तर्क की जगह टकराव ने ले ली है। 10 फरवरी 2026 की सुबह जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई, तो वातावरण में वह भारीपन था जो किसी बड़े संवैधानिक संकट की पूर्व आहट देता है। पिछले एक सप्ताह से जारी 'संसद गतिरोध' अब अपने चरम पर है। इस अभूतपूर्व संकट की जड़ें पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक के उन अंशों में छिपी हैं, जिन्हें विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में सदन में उठाने का प्रयास किया था।
यह केवल एक प्रक्रियात्मक विवाद नहीं है, बल्कि 22 वर्षों में पहली बार ऐसी स्थिति बनी है जब प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर 'धन्यवाद प्रस्ताव' का उत्तर दिए बिना ही सदन से अनुपस्थित रहे। आइए, एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक की दृष्टि से इस संवैधानिक गतिरोध के उन 5 सबसे गंभीर और चौंकाने वाले पहलुओं को समझते हैं।
"सुरक्षा का आवरण या राजनीतिक कवच?": प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति का रहस्य
सदन के भीतर सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति का बचाव करते हुए एक चौंकाने वाला दावा किया। अध्यक्ष के अनुसार, उन्हें "विश्वसनीय सूचना" मिली थी कि कांग्रेस की महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट का घेराव कर सकती हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और सदन की गरिमा को खतरा हो सकता था।
इस तर्क ने संवैधानिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। प्रियंका गांधी वाड्रा सहित छह महिला सांसदों ने अध्यक्ष को लिखे पत्र में इसे संस्थागत निष्पक्षता पर प्रहार बताया है।
"सदन से उनकी (प्रधानमंत्री) अनुपस्थिति हमारे द्वारा किसी खतरे के कारण नहीं थी, बल्कि यह डर का एक कृत्य था। उनमें विपक्ष का सामना करने का साहस नहीं था, इसीलिए अध्यक्ष को सरकार के दबाव में उनकी ओर से ऐसा बयान देना पड़ा, जो पूरी तरह गलत है।" - महिला कांग्रेस सांसदों का पत्र
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और 'माइक' का मौन: राहुल गांधी बनाम सत्तापक्ष
इस संकट का तात्कालिक कारण तब बना जब राहुल गांधी को भारत-चीन सीमा विवाद पर जनरल नरवणे की पुस्तक के संदर्भ में बोलने से रोका गया। जिस समय भाजपा सांसद संध्या राय सदन की अध्यक्षता कर रही थीं, राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें दिए गए "आश्वासन" के बावजूद बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है।
विपक्ष का आरोप है कि सदन में 'अभिव्यक्ति की आजादी' का गला घोंटा जा रहा है। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जहाँ सत्तापक्ष के नेताओं के विवादास्पद बयान भी रिकॉर्ड पर रहते हैं, वहीं विपक्ष का माइक काट दिया जाता है। इसके विपरीत, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का तर्क है कि राहुल गांधी अकेले नियम तय नहीं कर सकते और उन्हें चर्चा की मर्यादा का पालन करना होगा।
अविश्वास प्रस्ताव का 'नंबर गेम' और विपक्षी एकता की दरारें
लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए विपक्ष ने 'अविश्वास प्रस्ताव' की बिसात बिछा दी है। तकनीकी रूप से इसके लिए 100 हस्ताक्षरों की आवश्यकता होती है, और सूत्रों के अनुसार के.सी. वेणुगोपाल के नेतृत्व में 103 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
हालाँकि, यहाँ 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के भीतर की रणनीतिक दरारें भी स्पष्ट हैं। जहाँ सपा और द्रमुक (DMK) खुलकर साथ हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने एक 'सामरिक मौन' साध्य रखा है। अभिषेक बनर्जी का कहना है कि उन्होंने अध्यक्ष से केवल निलंबन वापसी की अपील की है, अविश्वास प्रस्ताव पर उनकी स्थिति अभी भी अनिश्चित है। यह दिखाता है कि विपक्ष संख्या बल से अधिक 'नैतिक दबाव' की राजनीति कर रहा है।
शशि थरूर की "अनभिज्ञता" और फ्लोर मैनेजमेंट की चुनौतियाँ
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने इस प्रस्ताव के बारे में अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। जहाँ एक ओर पार्टी अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी कर रही थी, वहीं थरूर का यह बयान पार्टी के भीतर 'फ्लोर मैनेजमेंट' की कमी को उजागर करता है।
"मुझसे इस बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है। मुझे केवल इतना पता है कि ऐसी एक मंशा है, लेकिन इसकी एक प्रक्रिया होती है और जब तक ऐसी कोई चीज़ औपचारिक रूप से फाइल नहीं की जाती, तब तक कोई खबर नहीं है।" - शशि थरूर
एक वरिष्ठ विश्लेषक के रूप में, यह देखना चिंताजनक है कि इतने बड़े संवैधानिक कदम से पहले पार्टी के अपने ही बौद्धिक चेहरे को भरोसे में नहीं लिया गया। क्या यह कांग्रेस के भीतर केवल कुछ खास रणनीतिकारों (जैसे के.सी. वेणुगोपाल) का वर्चस्व दर्शाता है?
संस्थागत पक्षपात और दोहरे मानदंड के आरोप
विपक्ष के गुस्से का एक बड़ा कारण सदन में 'निष्पक्षता' का अभाव है। सांसदों का आरोप है कि जहाँ एक ओर 8 विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया, वहीं भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा पूर्व प्रधानमंत्रियों (नेहरू और इंदिरा गांधी) के खिलाफ की गई कथित "अभद्र और अश्लील" टिप्पणियों को न तो रिकॉर्ड से हटाया गया और न ही उन पर कोई कार्रवाई की गई।
अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए विपक्ष ने कहा है कि वह अब "निर्णय लेने वाले" (Decision Maker) नहीं रहे, बल्कि सरकार के रबर स्टैम्प बन गए हैं। जनरल नरवणे की पुस्तक के मुद्दे पर चर्चा से इनकार करना इस पक्षपात का सबसे बड़ा प्रमाण माना जा रहा है।
यह भी पढ़ें:- जालंधर हत्याकांड: AAP नेता लकी ओबेरॉय की हत्या से जुड़े 4 सबसे चौंकाने वाले और चिंताजनक तथ्य
निष्कर्ष: लोकतंत्र के मंदिर में भविष्य की राह
बजट सत्र के पहले चरण के समाप्त होने में केवल चार दिन शेष हैं। बजट पारित करना एक संवैधानिक अनिवार्यता है, लेकिन जिस तरह का 'संसद गतिरोध' वर्तमान में व्याप्त है, उससे विधायी कार्यों के सुचारू संपादन पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर मेरा मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष का पद दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए। यदि सदन के भीतर विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए अविश्वास प्रस्ताव जैसे 'अंतिम अस्त्र' का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह हमारी संसदीय परंपराओं के क्षरण का संकेत है।
अब बड़ा सवाल यह है: क्या यह अविश्वास प्रस्ताव वास्तव में अध्यक्ष की कार्यशैली में बदलाव ला पाएगा, या यह केवल 2026 के चुनावी विमर्श को धार देने का एक राजनीतिक जरिया बनकर रह जाएगा?

