ड्रैगन की घेराबंदी: क्या 'क्वाड' (QUAD) बनेगा एशिया का नाटो? जानिए कैसे भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने उड़ाई है चीन की नींद
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व, विस्तारवादी नीतियों और आक्रामक सैन्य उभार को कुचलने के लिए दुनिया की चार बड़ी महाशक्तियां एक अभूतपूर्व रणनीतिक मोर्चे पर साथ आ चुकी हैं।
क्वाड (QUAD) अब केवल एक कूटनीतिक संवाद का मंच नहीं रहा है, बल्कि यह बीजिंग के लिए सबसे बड़ा भू-राजनीतिक दुःस्वप्न बन चुका है, जिसने वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी है।
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क्वाड (QUAD) क्या है? एक कूटनीतिक विचार से रणनीतिक हथियार तक का सफर
इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक युद्ध किसी मैदानी इलाके में नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) महासागर की अशांत लहरों पर लड़ा जा रहा है। इसी कूटनीतिक और रणनीतिक युद्ध के केंद्र में खड़ा है 'क्वाड' (Quadrilateral Security Dialogue - चतुर्भुज सुरक्षा संवाद)। यह चार प्रमुख लोकतांत्रिक देशों—भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया—का एक ऐसा अनौपचारिक लेकिन बेहद शक्तिशाली रणनीतिक मंच है, जिसका प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और शक्ति का संतुलन बनाए रखना है। यह कोई साधारण गठबंधन नहीं है; यह एक स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित समुद्री ढांचे को सुनिश्चित करने की एक तत्काल आवश्यकता का परिणाम है।
दुनिया का लगभग 60% समुद्री व्यापार हिंद-प्रशांत क्षेत्र से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी एक देश के एकाधिकार का मतलब है पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बना लेना। चीन ठीक यही करने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर (South China Sea) के कृत्रिम द्वीपों पर सैन्य ठिकानों के निर्माण से लेकर ताइवान को दी जा रही धमकियों तक, बीजिंग का आक्रामक रवैया वैश्विक सुरक्षा के लिए एक 'रेड अलर्ट' बन चुका है। इसी खतरे को भांपते हुए, क्वाड के सदस्य देशों ने अपने मतभेदों को किनारे रखकर एक साझा मंच तैयार किया है। क्वाड का संदेश स्पष्ट है: अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र किसी एक देश की जागीर नहीं है, और अंतरराष्ट्रीय कानून (जैसे UNCLOS) का पालन हर हाल में सुनिश्चित किया जाएगा।
- रणनीतिक धुरी: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को चीनी आधिपत्य से मुक्त रखना और 'नेविगेशन की स्वतंत्रता' (Freedom of Navigation) सुनिश्चित करना।
- आर्थिक सुरक्षा: महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains), विशेषकर सेमीकंडक्टर और रेयर-अर्थ खनिजों के लिए चीन पर निर्भरता को खत्म करना।
- समुद्री निगरानी: 'डार्क शिप्स' और चीनी नौसेना की अवैध गतिविधियों को सैटेलाइट और रडार नेटवर्क के जरिए ट्रैक करना।
- तकनीकी वर्चस्व: 5G, 6G, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी भविष्य की क्रिटिकल तकनीकों पर लोकतांत्रिक देशों का नियंत्रण स्थापित करना।
स्थापना का इतिहास: जब 'ड्रैगन' के दबाव में बिखर गया था क्वाड का पहला स्वरूप
क्वाड का विचार रातों-रात पैदा नहीं हुआ। इसकी जड़ें वर्ष 2004 में आई विनाशकारी हिंद महासागर सूनामी में खोजी जा सकती हैं, जब इन चारों देशों ने राहत और बचाव कार्यों के लिए पहली बार एक 'सुनामी कोर ग्रुप' के रूप में साथ मिलकर काम किया था। इस सफल समन्वय ने एक बीज बो दिया था। वर्ष 2007 में, जापान के दूरदर्शी और तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भारतीय संसद में अपने ऐतिहासिक "दो समुद्रों का मिलन" (Confluence of the Two Seas) भाषण के दौरान क्वाड का औपचारिक प्रस्ताव रखा। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था—एशिया में एक "लोकतांत्रिक सुरक्षा हीरा" (Democratic Security Diamond) बनाना, जो भारतीय और प्रशांत महासागरों की रक्षा कर सके।
लेकिन 2007 का वह समय आज से बहुत अलग था। उस वक्त चीन का आर्थिक उभार दुनिया के लिए एक अवसर माना जाता था, खतरा नहीं। जैसे ही क्वाड 1.0 की रूपरेखा बनी, बीजिंग में खतरे की घंटियां बजने लगीं। चीन ने तुरंत आक्रामक कूटनीति का सहारा लिया और चारों देशों को कड़े डिमार्श (विरोध पत्र) भेजे। चीनी आर्थिक प्रतिशोध के डर से सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविन रड ने इस समूह से किनारा कर लिया। भारत भी गुटनिरपेक्षता की अपनी ऐतिहासिक नीति के कारण झिझक रहा था, और अमेरिका इराक व अफगानिस्तान के युद्धों में उलझा हुआ था। नतीजतन, क्वाड 1.0 जन्म लेने से पहले ही कोमा में चला गया। बीजिंग ने चैन की सांस ली।
| कालखंड (Timeline) | क्वाड के विकास के महत्वपूर्ण चरण (Key Milestones) |
|---|---|
| 2004 | हिंद महासागर सूनामी के बाद 'सुनामी कोर ग्रुप' के रूप में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का पहला बड़ा नौसैनिक और मानवीय समन्वय। |
| 2007 | जापानी पीएम शिंजो आबे द्वारा 'क्वाड' का पहला औपचारिक प्रस्ताव। चीनी दबाव और ऑस्ट्रेलिया के पीछे हटने से मंच का पतन। |
| 2017 | आसियान (ASEAN) शिखर सम्मेलन, मनीला में क्वाड 2.0 का पुनर्जन्म। चीन की आक्रामक नीतियों के खिलाफ चारों देशों की संयुक्त सचिव स्तर की बैठक। |
| 2020 | गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत का कड़ा रुख। ऑस्ट्रेलिया को मालाबार नौसैनिक अभ्यास (Malabar Exercise) में फिर से शामिल किया गया। |
| 2021 | क्वाड का पहला 'लीडर्स समिट' (शीर्ष नेताओं का शिखर सम्मेलन)। क्वाड को वैश्विक भू-राजनीति के सबसे शक्तिशाली मंच के रूप में स्थापित किया गया। |
क्वाड 2.0 का उदय: कैसे शी जिनपिंग की आक्रामकता ने इस मंच को फिर से जीवित किया?
पूरे एक दशक तक क्वाड ठंडे बस्ते में रहा। लेकिन इस दौरान चीन ने अपनी 'शांतिपूर्ण उदय' (Peaceful Rise) की नकाब उतार फेंकी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने दक्षिण चीन सागर में 'नाइन-डैश लाइन' (Nine-Dash Line) के जरिए समूचे समुद्री क्षेत्र पर अपना अवैध दावा ठोक दिया। उसने अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसलों को कूड़ेदान में डाल दिया, कृत्रिम द्वीपों पर मिसाइलें तैनात कर दीं, और 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के जरिए छोटे देशों को 'डेब्ट-ट्रैप' (कर्ज के जाल) में फंसाना शुरू कर दिया। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया, जिसे चीन ने 99 साल की लीज पर हथिया लिया। दुनिया को अब समझ आ गया था कि ड्रैगन को रोकने के लिए अकेले काम करना आत्महत्या के समान है।
नवंबर 2017, मनीला में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान क्वाड का पुनर्जन्म (Quad 2.0) हुआ। इस बार परिस्थितियां बदल चुकी थीं। अमेरिका को समझ आ गया था कि चीन उसके वैश्विक आधिपत्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जापान लगातार पूर्वी चीन सागर में सेनकाकू द्वीपों (Senkaku Islands) के पास चीनी नौसेना की घुसपैठ झेल रहा था। ऑस्ट्रेलिया व्यापारिक युद्ध (Trade War) और चीनी आर्थिक ब्लैकमेल का शिकार हो चुका था। और भारत के लिए, चीन केवल एक समुद्री खतरा नहीं, बल्कि एक जमीनी खतरा भी था। डोकलाम (2017) और बाद में गलवान घाटी (2020) में हुए हिंसक सैन्य संघर्षों ने भारत की विदेश नीति में एक भू-राजनीतिक भूकंप ला दिया। भारत ने अपनी ऐतिहासिक हिचकिचाहट त्याग दी और क्वाड को पूरी ताकत से गले लगा लिया।
| सदस्य देश (Member Country) | क्वाड में शामिल होने का मुख्य रणनीतिक कारण (Strategic Motivation) |
|---|---|
| भारत (India) | वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीनी आक्रामकता का सामना करना, 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति को तोड़ना, और हिंद महासागर में मुख्य सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) बने रहना। |
| संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) | वैश्विक महाशक्ति (Superpower) के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखना, चीन के तकनीकी और सैन्य विस्तार को रोकना, और अपने एशियाई सहयोगियों की सुरक्षा की गारंटी देना। |
| जापान (Japan) | सेनकाकू द्वीपों पर चीनी कब्ज़े की कोशिशों को विफल करना, ताइवान जलडमरूमध्य में शांति बनाए रखना (जो जापान की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है), और समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखना। |
| ऑस्ट्रेलिया (Australia) | चीनी आर्थिक जबरदस्ती (Economic Coercion) और टैरिफ वॉर का मुकाबला करना, दक्षिण प्रशांत क्षेत्र (South Pacific) में चीनी सैन्य ठिकानों के निर्माण को रोकना। |
"क्वाड केवल समुद्र के झाग (Sea Foam) की तरह है, जो ध्यान खींचने के लिए हेडलाइन तो बना सकता है, लेकिन जल्द ही हवा के झोंके के साथ बिखर जाएगा।"
- वांग यी, चीनी विदेश मंत्री (2018 में क्वाड का मज़ाक उड़ाते हुए। आज यही क्वाड चीन के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक सिरदर्द बन चुका है।)चीन की छटपटाहट: क्या क्वाड वास्तव में एक 'एशियाई नाटो' (Asian NATO) है?
जैसे-जैसे क्वाड की जड़ें गहरी होती गईं, बीजिंग का लहजा मज़ाक से बदलकर गंभीर दहशत में तब्दील हो गया। चीनी विदेश मंत्रालय और उनके सरकारी मुखपत्र (जैसे ग्लोबल टाइम्स) लगातार क्वाड को "एशियाई नाटो" (Asian NATO) कहकर प्रचारित कर रहे हैं। चीन का तर्क है कि अमेरिका अपने पश्चिमी सहयोगियों के साथ मिलकर जिस तरह यूरोप में नाटो (NATO) के जरिए रूस को नियंत्रित करता है, ठीक उसी 'शीत युद्ध की मानसिकता' (Cold War Mentality) के साथ वह एशिया में चीन के खिलाफ एक सैन्य गुट खड़ा कर रहा है। चीन का आरोप है कि यह एक "विशेष और संकीर्ण गुट" (Exclusive Clique) है, जो क्षेत्र में हथियारों की होड़ और वैचारिक विभाजन को बढ़ावा दे रहा है।
लेकिन क्या क्वाड वास्तव में नाटो है? इसका जवाब है- नहीं। क्वाड सदस्य देशों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि यह कोई सामूहिक सुरक्षा संधि (Collective Security Treaty) नहीं है। नाटो के 'अनुच्छेद 5' (Article 5) की तरह क्वाड में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कई वैश्विक मंचों पर चीन के इस नैरेटिव को ध्वस्त करते हुए कहा है कि क्वाड किसी के 'खिलाफ' नहीं है, बल्कि यह एक 'सकारात्मक एजेंडे' के लिए है। क्वाड का ध्यान सैन्य गठजोड़ से ज्यादा बुनियादी ढांचे के विकास, समुद्री सुरक्षा, साइबर रक्षा और आपदा प्रबंधन पर केंद्रित है। हालांकि, चीन भली-भांति जानता है कि भले ही क्वाड के पास कोई लिखित सैन्य संधि न हो, लेकिन इन चार ताकतों का एक साथ आना ही चीन के सैन्य दुस्साहस के लिए एक अभेद्य दीवार है।
| तुलनात्मक बिंदु (Comparison) | नाटो (NATO) | क्वाड (QUAD) |
|---|---|---|
| प्रकृति (Nature) | औपचारिक सैन्य गठबंधन (Formal Military Alliance) | अनौपचारिक रणनीतिक और कूटनीतिक मंच (Informal Strategic Forum) |
| सामूहिक रक्षा (Collective Defense) | हाँ, अनुच्छेद 5 के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी। | नहीं, कोई बाध्यकारी सैन्य संधि या समझौता नहीं। |
| मुख्य उद्देश्य (Primary Focus) | सैन्य निवारण (विशेष रूप से रूस के खिलाफ)। | मुक्त इंडो-पैसिफिक, समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और कूटनीतिक निवारण। |
| संरचना (Structure) | केंद्रीकृत सैन्य कमान, विशाल स्थायी बजट और मुख्यालय। | कोई स्थायी मुख्यालय नहीं, केवल नियमित शिखर सम्मेलन और संयुक्त कार्यदल। |
सैन्य समन्वय और मालाबार अभ्यास: समुद्र में ड्रैगन को घेरने की तैयारी
भले ही क्वाड एक औपचारिक सैन्य गठबंधन न हो, लेकिन इसके सैन्य आयाम (Military Dimension) को नजरअंदाज करना भारी भूल होगी। क्वाड की मारक क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण 'मालाबार नौसैनिक अभ्यास' (Malabar Naval Exercise) है। यह अभ्यास मूल रूप से 1992 में भारत और अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय नौसैनिक ड्रिल के रूप में शुरू हुआ था। बाद में जापान इसका स्थायी सदस्य बना। लेकिन 2020 में, चीन के साथ बढ़ते तनाव (विशेषकर गलवान के बाद), भारत ने ऑस्ट्रेलिया को इस अभ्यास में शामिल होने का न्योता दे दिया। चारों क्वाड देशों की नौसेनाओं का एक साथ युद्धाभ्यास करना चीन के लिए एक सीधा और कड़ा रणनीतिक संदेश था।
आज मालाबार अभ्यास दुनिया के सबसे जटिल और मारक नौसैनिक अभ्यासों में से एक बन चुका है। इसमें विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers), परमाणु पनडुब्बियां, और उन्नत लड़ाकू विमान हिस्सा लेते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य 'इंटरऑपरेबिलिटी' (Interoperability) यानी अंतःक्रियाशीलता को बढ़ाना है। इसका मतलब यह है कि संकट के समय में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की सेनाएं बिना किसी तकनीकी बाधा के एक साथ मिलकर दुश्मन (यानी चीनी नौसेना) के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा खोल सकती हैं। इसके अलावा, क्वाड देशों ने एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल के लिए लॉजिस्टिक समझौते (जैसे भारत और अमेरिका के बीच LEMOA) भी किए हैं, जो हिंद-प्रशांत में उनकी पहुँच को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देते हैं।
- IPMDA (Indo-Pacific Maritime Domain Awareness): क्वाड की एक क्रांतिकारी पहल। इसके तहत सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उन 'डार्क शिप्स' (Dark Ships) को ट्रैक किया जा रहा है, जो अपने नेविगेशन सिस्टम को बंद करके अवैध रूप से मछली पकड़ते हैं या जासूसी करते हैं। इसका सीधा निशाना चीन का विशाल और आक्रामक मैरीटाइम मिलिशिया है।
- पनडुब्बी रोधी युद्ध (Anti-Submarine Warfare): क्वाड देश लगातार अपने P-8I (भारत) और P-8A (अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया) समुद्री टोही विमानों के जरिए गहरे समुद्र में चीनी पनडुब्बियों की गतिविधियों पर नज़र रख रहे हैं।
- खुफिया जानकारी साझा करना (Intelligence Sharing): रीयल-टाइम डेटा और रणनीतिक खुफिया जानकारियों का निर्बाध आदान-प्रदान, जिससे चीनी सैन्य हरकतों की अग्रिम चेतावनी मिल सके।
- साइबर सुरक्षा: चीनी हैकर्स (State-sponsored Hackers) द्वारा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (पावर ग्रिड, बैंकिंग) पर होने वाले साइबर हमलों को विफल करने के लिए संयुक्त साइबर रक्षा ग्रिड तैयार करना।
निष्कर्ष: क्या चीन क्वाड के इस चक्रव्यूह को तोड़ पाएगा?
क्वाड आज के दौर की भू-राजनीतिक वास्तविकता बन चुका है। यह केवल एक बैठक या बयानबाजी का मंच नहीं है; यह 21वीं सदी में शक्ति संतुलन का सबसे अहम साधन है। चीन इसे अपने उदय को रोकने की साजिश मानता है, और इसलिए वह क्वाड को कमज़ोर करने के लिए हर संभव कूटनीतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रहा है। बीजिंग की रणनीति स्पष्ट है: क्वाड के सदस्य देशों के बीच दरार पैदा करना। लेकिन चीन की अपनी विस्तारवादी और आक्रामक नीतियां ही क्वाड को हर गुज़रते दिन के साथ और अधिक मज़बूत और प्रासंगिक बना रही हैं।
भविष्य में क्वाड का दायरा केवल सैन्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। यह तकनीक, स्पेस, क्लाइमेट चेंज और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) के नए नियम तय करेगा। क्वाड देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे किस तरह छोटे प्रशांत द्वीपीय देशों (Pacific Island Nations) और आसियान (ASEAN) देशों को यह विश्वास दिला पाते हैं कि क्वाड उन्हें चीन के खिलाफ युद्ध में मोहरा नहीं बना रहा है, बल्कि उनके संप्रभु अधिकारों की रक्षा कर रहा है। हिंद-प्रशांत का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि क्वाड कितनी तेज़ी से अपने फैसलों को ज़मीन पर उतारता है, क्योंकि ड्रैगन किसी का इंतज़ार नहीं करने वाला।
क्वाड का उदय इस बात का स्पष्ट संकेत है कि एकध्रुवीय विश्व अब समाप्त हो चुका है और एशिया में चीन के एकतरफा वर्चस्व को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह एक नए शीत युद्ध की शुरुआत हो सकती है, लेकिन इस बार कुरुक्षेत्र हिंद-प्रशांत का विस्तृत जलक्षेत्र है।
क्वाड (QUAD) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
क्वाड का मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र को स्वतंत्र, खुला, समावेशी और समृद्ध बनाए रखना है। यह सुनिश्चित करता है कि समुद्र में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन हो, नेविगेशन की स्वतंत्रता बनी रहे और कोई भी एक देश (मुख्यतः चीन) अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के बल पर छोटे देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित न कर सके। इसके अलावा, तकनीकी सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और समुद्री निगरानी भी इसके प्रमुख लक्ष्य हैं।
क्या चीन क्वाड को 'एशियाई नाटो' (Asian NATO) मानता है?
हाँ, चीन आधिकारिक तौर पर क्वाड को 'एशियाई नाटो' कहता है। चीन का मानना है कि अमेरिका इस मंच के ज़रिए भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया को भड़काकर चीन के खिलाफ एक सैन्य गठबंधन तैयार कर रहा है। चीन इसे शीत युद्ध की मानसिकता और गुटीय राजनीति का हिस्सा मानता है, जिसका अंतिम लक्ष्य चीन की आर्थिक और सैन्य प्रगति की घेराबंदी करना है।
भारत के लिए क्वाड का क्या महत्व है?
भारत के लिए क्वाड अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत को हिंद महासागर में अपनी सुरक्षा स्थिति मज़बूत करने में मदद करता है। चीन के साथ सीमा विवाद (जैसे गलवान संघर्ष) और हिंद महासागर में चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति को काउंटर करने के लिए भारत को अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी उन्नत तकनीकी और सैन्य शक्तियों के सहयोग की आवश्यकता है। क्वाड भारत को इस क्षेत्र में 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' की भूमिका को पुख्ता करता है।
मालाबार नौसैनिक अभ्यास (Malabar Exercise) क्या है?
मालाबार अभ्यास एक बहुपक्षीय नौसैनिक युद्धाभ्यास है जिसमें क्वाड के चारों सदस्य देश (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) हिस्सा लेते हैं। इसका उद्देश्य इन चारों देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल (Interoperability) बढ़ाना है ताकि वे समुद्री खतरों का मिलकर सामना कर सकें। यह अभ्यास क्वाड की सैन्य एकजुटता का सबसे बड़ा प्रदर्शन माना जाता है।
क्वाड देशों द्वारा शुरू की गई 'IPMDA' पहल क्या है?
IPMDA (Indo-Pacific Maritime Domain Awareness) क्वाड देशों द्वारा शुरू की गई एक अत्याधुनिक समुद्री निगरानी प्रणाली है। इसके तहत सैटेलाइट और रडार डेटा का उपयोग करके समुद्र में 'डार्क शिप्स' (वे जहाज़ जो अपना ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके अवैध गतिविधियाँ करते हैं) को ट्रैक किया जाता है। इसका मुख्य निशाना चीनी मछली पकड़ने वाले अवैध जहाज़ और समुद्री मिलिशिया हैं जो अक्सर दूसरे देशों के जलक्षेत्र में घुसपैठ करते हैं।