क्या भारत अब अपनी वायु शक्ति को नए स्तर पर ले जाने जा रहा है?
सीमाओं पर बढ़ते तनाव और घटती स्क्वाड्रन संख्या के बीच, 114 राफेल लड़ाकू विमानों की मंजूरी ने देश की रक्षा रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये का यह प्रस्ताव सिर्फ एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की सुरक्षा का खाका माना जा रहा है।
आइए समझते हैं कि यह फैसला इतना बड़ा क्यों है।
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सिर्फ खरीद नहीं, शक्ति प्रदर्शन
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ दी है।
सीधा मतलब?
भारत यह दिखाना चाहता है कि उसकी हवाई ताकत किसी भी हाल में कमजोर नहीं पड़ेगी।
राफेल पहले ही अपनी क्षमता साबित कर चुका है। अब 114 नए विमानों का जुड़ना वायुसेना की मारक शक्ति को कई गुना बढ़ा सकता है।
18 फ्रांस से, 96 भारत में — असली खेल यहीं है
इस सौदे की असली ताकत इसके मॉडल में छिपी है।
- 18 विमान सीधे तैयार हालत में आएंगे
- 96 विमान भारत में बनेंगे
अगर तकनीक का सही हस्तांतरण हुआ, तो भारत लड़ाकू विमान निर्माण में बड़ी छलांग लगा सकता है।
यह “मेक इन इंडिया” के लिए सिर्फ नारा नहीं, बल्कि असली परीक्षा होगी।
वायुसेना की चिंता: 42 चाहिए, हैं सिर्फ 29
भारतीय वायुसेना को पूरी ताकत के लिए 42 स्क्वाड्रन चाहिए।
लेकिन अभी उसके पास सिर्फ 29 हैं।
पुराने मिग-21 रिटायर हो चुके हैं।
जगुआर और मिराज जैसे विमान भी धीरे-धीरे सेवा से बाहर होंगे।
ऐसे में सवाल साफ है —
अगर आज तैयारी नहीं हुई, तो कल मुश्किल हो सकता है।
तेजस की देरी और इंजन की चुनौती
भारत का स्वदेशी तेजस कार्यक्रम उम्मीद जगाता है।
लेकिन इंजन सप्लाई में देरी के कारण उत्पादन की रफ्तार धीमी है।
राफेल सौदा यहां “बैकअप प्लान” की तरह दिखता है।
जब तक स्वदेशी उत्पादन पूरी ताकत नहीं पकड़ता, तब तक राफेल सुरक्षा का संतुलन बनाए रख सकता है।
सिर्फ जेट नहीं, पूरा युद्ध तंत्र
आधुनिक युद्ध अब नेटवर्क से लड़ा जाता है।
नौसेना के लिए राफेल-M,
लंबी दूरी की निगरानी प्रणाली,
टोही विमान और उन्नत मिसाइलें —
ये सब मिलकर भारत की रक्षा क्षमता को एक नई दिशा देते हैं।
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अंतिम सवाल: आत्मनिर्भरता या नई निर्भरता?
114 राफेल का यह सौदा भारत को ताकत देता है।
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी।
क्या भारत तकनीक में सचमुच आत्मनिर्भर बनेगा?
या फिर हम विदेशी तकनीक पर एक नए तरीके से निर्भर रहेंगे?
फैसला बड़ा है।
दांव उससे भी बड़ा।
और आने वाले साल तय करेंगे कि यह सौदा इतिहास में किस रूप में दर्ज होगा।
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