ढाका की सड़कों पर इस बार शोर कम है, लेकिन सियासत का तापमान पहले से कहीं ज्यादा है।
कुछ ही साल पहले तक जिसे ‘हसीना युग’ कहा जाता था, वह अब इतिहास बन चुका है। और 2026 का यह चुनाव केवल एक राजनीतिक जीत नहीं — बल्कि एक पूरे दौर का अंत माना जा रहा है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बीएनपी (BNP) जीती या अवामी लीग हारी।
असली सवाल यह है —
क्या बांग्लादेश ने सचमुच एक नई शुरुआत की है?
या सत्ता का पहिया बस घूमकर वहीं लौट आया है?
यह चुनाव दक्षिण एशिया की राजनीति, भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
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बीएनपी की वापसी: सत्ता का वनवास खत्म
लगभग डेढ़ दशक तक विपक्ष में रहने के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने जबरदस्त वापसी की है।
“मैं उनसे बेहतर करने की कोशिश करूँगा।”
— तारिक रहमान {alertInfo}
अब सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ हैं:
- राजनीतिक स्थिरता
- आर्थिक सुधार
जमात-ए-इस्लामी की भूमिका
जमात-ए-इस्लामी ने उल्लेखनीय सीटें हासिल की हैं, जिससे संसद में उसका प्रभाव बढ़ा है।
भारत के नजरिए से यह सवाल महत्वपूर्ण है — क्या यह राजनीतिक इस्लामी प्रभाव का पुनरुत्थान है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक विस्तार?
‘जुलाई चार्टर’ और संवैधानिक बदलाव
कार्यकाल सीमा, शक्तियों का पुनर्संतुलन और उच्च सदन का प्रस्ताव — ये केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के संकेत हैं।
‘जेनरेशन जी’ की एंट्री
युवा राजनीति अब संगठित रूप ले चुकी है। यह पुरानी “हसीना बनाम जिया” राजनीति से आगे बढ़ने का संकेत है।
भारत-बांग्लादेश संबंध
भारत के लिए बांग्लादेश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है — सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी के लिहाज़ से।
असली चुनौती: स्थिरता या प्रतिशोध?
- संस्थागत सुधार
- राजनीतिक बदला
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निष्कर्ष: क्या यह बदलाव स्थायी है?
2026 का यह चुनाव केवल एक देश की कहानी नहीं — यह दक्षिण एशिया की बदलती राजनीति का संकेत है।
अब गेंद तारिक रहमान के पाले में है।
क्या ढाका भारत के लिए भरोसेमंद साझेदार बना रहेगा?
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