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अमेरिका-ईरान तनाव: जेनेवा में बातचीत, खाड़ी में युद्धपोत और तेहरान से कड़ी चेतावनी
17 फरवरी 2026 तक की घटनाएं यह दिखाती हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते एक बार फिर बेहद नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। एक ओर जेनेवा में परमाणु वार्ता के जरिए समाधान तलाशने की कोशिशें चल रही हैं, तो दूसरी ओर फारस की खाड़ी में युद्धपोतों की तैनाती और तीखी बयानबाजी माहौल को और गरमा रही है।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने सीधे तौर पर अमेरिका और उसके नेतृत्व को चेतावनी दी है। उनका कहना है कि सैन्य ताकत का दिखावा किसी को अजेय नहीं बनाता। उन्होंने अमेरिकी दावों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “दुनिया की सबसे मजबूत सैन्य शक्ति को भी कभी-कभी ऐसी चोट लग सकती है कि वह दोबारा खड़ी न हो सके।”
खाड़ी में युद्धपोत, तेहरान का जवाब
ओमान की मध्यस्थता में चल रही वार्ता के बीच अमेरिका ने फारस की खाड़ी और आसपास के इलाकों में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाई है। विमानवाहक पोतों और युद्धपोतों की तैनाती को लेकर तेहरान ने इसे दबाव की रणनीति बताया है।
खामेनेई ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि युद्धपोत भले ही खतरनाक सैन्य ताकत का प्रतीक हों, लेकिन “उससे भी ज्यादा खतरनाक वह हथियार है जो उन्हें समुद्र के तल तक भेज सकता है।” इस बयान को क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर एक साफ संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
परमाणु कार्यक्रम पर सख्त रुख
ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को संप्रभु अधिकार बताया है। खामेनेई का कहना है कि ईरान का परमाणु उद्योग युद्ध के लिए नहीं, बल्कि कृषि, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे नागरिक क्षेत्रों के लिए है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परमाणु मानकों का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण परमाणु संवर्धन किसी भी राष्ट्र का अधिकार है।
उन्होंने अमेरिका की उस शर्त को खारिज किया, जिसमें वार्ता का अंतिम परिणाम ईरान द्वारा परमाणु गतिविधियों को सीमित या समाप्त करना माना जा रहा है। उनके शब्दों में, “यदि बातचीत का नतीजा पहले से तय है, तो फिर बातचीत का अर्थ ही क्या रह जाता है?”
‘47 वर्षों की विफलता’ का तर्क
ईरान-अमेरिका टकराव की जड़ें 1979 की इस्लामी क्रांति से जुड़ी हैं। खामेनेई ने कहा कि पिछले 47 वर्षों में अमेरिका ईरान के इस्लामी शासन को बदलने में सफल नहीं हो पाया। उन्होंने इसे अमेरिकी नीति की “ऐतिहासिक असफलता” बताया और यह संकेत दिया कि भविष्य में भी ऐसी कोशिशें नाकाम ही रहेंगी।
उन्होंने अमेरिकी हस्तक्षेप को एक “पतनशील साम्राज्य की बेचैनी” करार दिया। यह बयान साफ तौर पर राजनीतिक संदेश भी है और घरेलू समर्थन को मजबूत करने की कोशिश भी।
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जेनेवा में बातचीत, लेकिन साए में सैन्य दबाव
जेनेवा में ओमान की मध्यस्थता से हुई वार्ता के दूसरे दौर के बाद तेहरान ने दावा किया है कि “मुख्य सिद्धांतों पर समझ” बनी है। हालांकि इस समझ की प्रकृति और दायरा सार्वजनिक नहीं किया गया है।
उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। पिछले वर्ष शुरू किए गए “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाना बताया गया था। साथ ही, क्षेत्र में नौसैनिक तैनाती को रणनीतिक संतुलन का हिस्सा कहा गया है।
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आगे का रास्ता
मौजूदा स्थिति विरोधाभासों से भरी है। एक तरफ कूटनीतिक वार्ता से उम्मीदें जुड़ी हैं, तो दूसरी ओर तल्ख बयानबाजी और सैन्य तैयारी अविश्वास को गहरा रही है।
ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी मिसाइल क्षमता और परमाणु अधिकारों को राष्ट्रीय संप्रभुता का हिस्सा मानता है। वहीं अमेरिका दबाव और बातचीत—दोनों रास्तों पर एक साथ चल रहा है।
आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि जेनेवा की मेज पर बनी “समझ” तनाव कम करेगी या खाड़ी के पानी में तैरते युद्धपोत ही सुर्खियों में बने रहेंगे। फिलहाल, दुनिया की निगाहें तेहरान और वाशिंगटन—दोनों पर टिकी हैं।
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FAQs: अमेरिका-ईरान तनाव 2026 और जेनेवा परमाणु वार्ता से जुड़े अहम सवाल
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया तनाव की मुख्य वजह क्या है?
फारस की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों और विमानवाहक पोतों की बढ़ती तैनाती, ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर दबाव और “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के बाद बढ़ी सैन्य बयानबाजी ने दोनों देशों के रिश्तों को फिर से तनावपूर्ण बना दिया है।
जेनेवा में चल रही परमाणु वार्ता का उद्देश्य क्या है?
ओमान की मध्यस्थता में हो रही जेनेवा वार्ता का लक्ष्य परमाणु कार्यक्रम को लेकर न्यूनतम सहमति बनाना और संभावित सैन्य टकराव को टालना है। तेहरान ने दावा किया है कि कुछ मुख्य सिद्धांतों पर प्रारंभिक समझ बनी है।
क्या ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने को तैयार है?
ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों—जैसे ऊर्जा, कृषि और स्वास्थ्य—के लिए है। तेहरान किसी भी ऐसी शर्त को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है, जिसमें पहले से परिणाम तय कर दिए जाएं।
अमेरिका की रणनीति क्या संकेत देती है?
वाशिंगटन एक साथ दो रास्तों पर चल रहा है—एक तरफ कूटनीतिक वार्ता, दूसरी तरफ क्षेत्र में सैन्य दबाव। युद्धपोतों की मौजूदगी को रणनीतिक संतुलन और सुरक्षा हितों से जोड़ा जा रहा है।
{alertSuccess}क्या आने वाले समय में युद्ध की आशंका है?
फिलहाल दोनों देशों के बीच बयानबाजी तीखी है, लेकिन बातचीत जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वार्ता सफल रही तो तनाव कम हो सकता है, अन्यथा क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

