क्या भारत की अर्थव्यवस्था 12 फरवरी, 2026 को एक अभूतपूर्व संरचनात्मक ठहराव का सामना करने वाली है? देश भर के करोड़ों श्रमिकों और किसानों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यह 'भारत बंद' केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते और व्यापक श्रम सुधारों के कारण पैदा हुई 'आर्थिक संप्रभुता के संकट' पर एक राष्ट्रव्यापी विमर्श है। जहां सत्ता के गलियारों में इसे विकास का 'स्वर्ण युग' कहा जा रहा है, वहीं ज़मीन पर इसे 'विश्वासघात' की संज्ञा दी जा रही है।
एक वरिष्ठ सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक के रूप में, मैंने इस व्यापक आंदोलन के उन पहलुओं का विश्लेषण किया है जो न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा भी तय करेंगे।
टेकअवे 1: 30 करोड़ श्रमिकों की लामबंदी—इतिहास का सबसे बड़ा प्रतिरोध
इस 'भारत बंद' का सबसे प्रभावी पहलू इसका विशाल पैमाना है। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने इस हड़ताल का आह्वान किया है, जिसमें लगभग 30 करोड़ श्रमिकों के शामिल होने का अनुमान है। यदि हम तुलनात्मक दृष्टि से देखें, तो यह संख्या जुलाई 2025 के आंदोलन (25 करोड़) से कहीं अधिक है, जो देश में गहराते असंतोष की गंभीरता को दर्शाता है।
यह लामबंदी किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के 600 से अधिक जिलों में विस्तारित है। विशेष रूप से ओडिशा और असम जैसे राज्यों में पूर्ण बंदी (Total Shutdown) की संभावना जताई जा रही है।
शामिल होने वाली प्रमुख यूनियनें: INTUC, AITUC, HMS, CITU, AIUTUC, TUCC, SEWA, AICCTU, LPF और UTUC।
टेकअवे 2: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता—'सुनहरे अक्षर' बनाम 'विश्वासघात'
इस ट्रेड यूनियन हड़ताल के केंद्र में भारत-अमेरिका के बीच हुआ नया व्यापारिक ढांचा है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इसे भारतीय आर्थिक इतिहास में "सुनहरे अक्षरों" में अंकित होने वाला कदम बताया है। हालांकि, संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का विश्लेषण इसके विपरीत है। उनके अनुसार, अमेरिका की "चतुराई" के सामने समर्पण करने से भारतीय कृषि क्षेत्र की कमर टूट जाएगी।
हन्नान मोल्लाह के नेतृत्व में 4 फरवरी से 11 फरवरी तक चले सघन जन-संपर्क अभियान ने इस आंदोलन की नींव तैयार की है। विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखें तो मुख्य चिंता यह है कि अमेरिका से सस्ते आयात के अनियंत्रित प्रवाह के कारण स्वदेशी किसान प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगे।
"यह समझौता किसानों के साथ विश्वासघात होगा... हम अमेरिका की चतुराई के सामने समर्पण कर रहे हैं। सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। पीयूष गोयल को इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि उन्होंने भारतीय किसानों को धोखा दिया है। अमेरिकी आयात के मुक्त प्रवाह के सामने हमारा उत्पादन टिक नहीं पाएगा और हमारे किसान बर्बाद हो जाएंगे।" — हन्नान मोल्लाह, संयोजक, संयुक्त किसान मोर्चा (SKM)
टेकअवे 3: केवल श्रम कोड ही नहीं, विधायी सुरक्षा पर भी संकट
अक्सर चर्चा केवल 4 नए श्रम कोडों तक सीमित रह जाती है, जो 29 कानूनों को प्रतिस्थापित कर रहे हैं। लेकिन एक विश्लेषक के रूप में, हमें उन अन्य विधेयकों को भी देखना होगा जिन्होंने इस आग में घी का काम किया है। आंदोलकारी केवल 'हायर एंड फायर' (भर्ती और छंटनी) के नियमों का ही विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनकी मांगों की सूची कहीं अधिक विस्तृत है।
प्रमुख विधायी और आर्थिक चिंताएं:
- श्रम कोड: भर्ती और छंटनी के नियमों को लचीला बनाकर नौकरी की सुरक्षा को खत्म करना।
- SHANTI Act और ड्राफ्ट सीड बिल: कृषि और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक बदलावों पर आपत्ति।
- बिजली संशोधन विधेयक: बिजली क्षेत्र के निजीकरण और सब्सिडी पर संभावित प्रहार।
- MGNREGA का मुद्दा: 'विकसित भारत- ग्रामीण अधिनियम 2025' को निरस्त कर मनरेगा को पुनर्जीवित करने की मांग।
- सामाजिक सुरक्षा: अनौपचारिक क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों को कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा जाना।
टेकअवे 4: क्या खुला रहेगा और क्या होगा बंद? (व्यावहारिक निर्देशिका)
12 फरवरी को होने वाली इस ट्रेड यूनियन हड़ताल का व्यापक असर जनजीवन पर पड़ेगा। हालांकि आवश्यक सेवाएं बहाल रहेंगी, लेकिन नागरिकों को अपनी यात्रा और बैंकिंग कार्यों के लिए सावधानी बरतनी चाहिए।
प्रभावित होने वाली सेवाएं | सामान्य रूप से चालू सेवाएं |
सार्वजनिक बैंक: SBI और IDBI जैसे बैंकों ने चेतावनी दी है कि शाखाएं खुल सकती हैं, लेकिन चेक क्लियरिंग और कैश लेन-देन जैसी सेवाएं बाधित रहेंगी। | आपातकालीन सेवाएं: अस्पताल, एम्बुलेंस और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू रूप से कार्य करेंगी। |
परिवहन और बाजार: राज्य परिवहन की बसें, औद्योगिक इकाइयां (कोयला, इस्पात) और स्थानीय बाजार कई राज्यों में बंद रह सकते हैं। | आवश्यक आपूर्ति: दूध की आपूर्ति और दवा की दुकानें (Pharmacies) सामान्य रूप से खुली रहेंगी। |
शिक्षा संस्थान: केरल, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों में स्थानीय समर्थन के आधार पर स्कूल और कॉलेज बंद रह सकते हैं। | निजी क्षेत्र: निजी कार्यालय और आईटी कंपनियां स्थानीय स्थिति के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेंगे। |
सरकारी कार्य: मनरेगा (MGNREGA) से जुड़े कार्य और ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी विभागों में कामकाज ठप रहने की संभावना है। | डिजिटल बैंकिंग: ऑनलाइन बैंकिंग और एटीएम सेवाएं चालू रहने की उम्मीद है (संभावित तकनीकी देरी के साथ)। |
यह भी पढ़ें:- अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता: वे 4 चौंकाने वाले तथ्य जो मध्य-पूर्व की राजनीति को बदल सकते हैं
निष्कर्ष: आर्थिक विकास और श्रमिक अधिकारों का द्वंद्व
12 फरवरी का 'भारत बंद' केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के आर्थिक भविष्य के लिए एक लिटमस टेस्ट है। एक ओर वैश्विक व्यापार समझौतों के माध्यम से 'विकसित भारत' का स्वप्न है, तो दूसरी ओर 30 करोड़ श्रमिकों की 'आजीविका सुरक्षा' का प्रश्न।
जब हम आर्थिक उदारीकरण के मार्ग पर अग्रसर हैं, तो क्या हम 'हायर एंड फायर' की संस्कृति और मुक्त व्यापार के दबावों के बीच अपने श्रम बल और कृषक समाज को पर्याप्त सुरक्षा कवच प्रदान कर पा रहे हैं? यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के रूप में हम सभी से है—क्या समावेशी विकास के बिना कोई भी सुधार वास्तव में 'सुनहरा' हो सकता है?

