अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता: मध्य-पूर्व की राजनीति बदलने वाले 4 तथ्य

मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर इस समय एक अत्यंत निर्णायक खेल खेला जा रहा है। एक ओर जहाँ अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता (Iran-US nuclear talks) फिर से शुरू होने के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की आगामी अमेरिका यात्रा (Netanyahu US visit) ने कूटनीतिक गलियारों में तनाव और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। शक्ति संतुलन (Power Balance) की इस जद्दोजहद में दशकों पुरानी दुश्मनी और गहरा अविश्वास अब एक ऐसे मोड़ पर है, जहाँ ट्रंप की 'डील-मेकिंग' शैली का सामना ईरान के रणनीतिक धैर्य से होने वाला है। क्या यह वास्तव में शांति की दिशा में एक ठोस कदम है या केवल एक नई सामरिक बिसात?

Iran–US Nuclear Talks Iran Warns U.S. Over Israel’s Influence as Trump Signals Possible Deal

तथ्य #1: ईरान की दो-टूक चेतावनी – अमेरिका 'स्वतंत्र' बने, इज़राइल की भूमिका 'विनाशकारी'!

ईरान ने परमाणु वार्ता की मेज पर बैठने से पहले ही अपनी सीमाएं स्पष्ट कर दी हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय ने वाशिंगटन को कड़ा संदेश दिया है कि वह किसी भी बाहरी प्रभाव, विशेष रूप से इज़राइल के दबाव से मुक्त होकर कार्य करे। तेहरान का स्पष्ट मानना है कि शांति की राह में इज़राइल केवल एक 'विघ्नसंतोषी' की भूमिका निभा रहा है।

यहाँ यह समझना महत्वपूर्ण है कि ईरान आधिकारिक बयानों में इज़राइल को 'ज़ायोनी शासन' (Zionist regime) कहकर संबोधित करता है। एक अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ के रूप में यह स्पष्ट है कि इस शब्दावली का उपयोग केवल विरोध प्रकट करने के लिए नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर इज़राइल की संप्रभुता को चुनौती देने और उसे एक अवैध सत्ता के रूप में चित्रित करने के लिए किया जाता है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई (Esmail Baghaei) ने अमेरिका को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की सलाह देते हुए कहा:

"हमारा वार्ता पक्ष अमेरिका है। यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह उन दबावों और विनाशकारी प्रभावों से स्वतंत्र होकर काम करे जो क्षेत्र के लिए हानिकारक हैं। 'ज़ायोनी शासन' ने एक विघ्नसंतोषी के रूप में बार-बार दिखाया है कि वह हमारे क्षेत्र में शांति की ओर ले जाने वाली किसी भी राजनयिक प्रक्रिया का विरोध करता है।"

तथ्य #2: ट्रंप का अप्रत्याशित दावा – "नेतन्याहू भी चाहते हैं समझौता"

इस कूटनीतिक घटनाक्रम का सबसे आश्चर्यजनक पहलू डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान है जो उन्होंने इज़राइल के 'चैनल 12' और 'एक्सियोस' (Axios) को दिए साक्षात्कार में दिया। आमतौर पर परमाणु वार्ता का कट्टर विरोधी माना जाने वाला इज़राइल, ट्रंप के अनुसार, इस बार एक 'डील' के पक्ष में है। ट्रंप का यह दावा वैश्विक राजनीति के जानकारों के लिए चौंकाने वाला है क्योंकि यह स्थापित धारणाओं के विपरीत है।

ट्रंप के अनुसार, इस बार वार्ता का स्वरूप और दबाव का स्तर पिछली वार्ताओं से बिल्कुल भिन्न है। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान अब पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं है। 'Iran-US nuclear talks' पर टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा:

"पिछली बार उन्होंने (ईरान) विश्वास नहीं किया था कि मैं ऐसा करूँगा... उन्होंने अपनी चालें ज़रूरत से ज़्यादा चल दी थीं (They overplayed their hand)। इस बार, बातचीत बहुत अलग है। नेतन्याहू भी एक समझौता चाहते हैं। वे एक 'अच्छा' समझौता चाहते हैं। हम ईरान के साथ एक बेहतरीन डील कर सकते हैं।"

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तथ्य #3: रणनीतिक गतिरोध – 'यूरेनियम संवर्धन' बनाम 'मिसाइल कार्यक्रम'

वार्ता की मेज पर दिखने वाली सहजता के पीछे एक गंभीर सामरिक गतिरोध (Strategic Stalemate) छिपा है। 'Trump on Iran deal' का आधार दो अपरिवर्तनीय शर्तें हैं: ईरान के पास कोई परमाणु हथियार न हो और वह यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को पूरी तरह बंद करे। ट्रंप प्रशासन के लिए ईरान की संवर्धन क्षमता को शून्य पर लाना एक 'रेड लाइन' है।

दूसरी ओर, 'Netanyahu US visit' का प्राथमिक एजेंडा इस समझौते का दायरा बढ़ाना है। इज़राइल चाहता है कि किसी भी समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर पूर्ण प्रतिबंध और उसके क्षेत्रीय 'एक्सिस' (समर्थक समूहों) को मिलने वाली सैन्य सहायता पर रोक शामिल हो। लेकिन ईरान ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम उसकी सुरक्षा संप्रभुता का हिस्सा है और यह 'गैर-परक्राम्य' (non-negotiable) है। यह विरोधाभास किसी भी संभावित समझौते के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

तथ्य #4: ओमान की 'बैकचैनल' कूटनीति और सुरक्षा तंत्र की सक्रियता

पर्दे के पीछे की कूटनीति में ओमान एक बार फिर एक महत्वपूर्ण 'बैकचैनल' के रूप में उभरा है। मस्कट में हुई बैठकें इस बात का संकेत हैं कि वार्ता केवल औपचारिक राजनयिक स्तर पर नहीं, बल्कि गहरे सुरक्षा स्तर पर हो रही है। ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी और ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल सैद के बीच हुई चर्चा यह दर्शाती है कि तेहरान अपने सुरक्षा तंत्र (Security Apparatus) को इस प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल कर रहा है।

वर्तमान स्थिति यह है कि ट्रंप ने इसी सप्ताह वार्ता के अगले दौर की संभावना जताई है। ओमान की मध्यस्थता ने एक ऐसा मंच तैयार किया है जहाँ दोनों पक्ष अपनी शर्तों को परख रहे हैं। ट्रंप का संकेत कि वार्ता "इसी सप्ताह" हो सकती है, यह बताता है कि पर्दे के पीछे चीजें बहुत तेजी से आगे बढ़ रही हैं।

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भविष्य की राह: कूटनीति या क्षेत्रीय दबाव?

अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता का भविष्य अब इस नाजुक संतुलन पर निर्भर है कि अमेरिका, इज़राइल की अस्तित्वगत सुरक्षा चिंताओं और ईरान के इस आग्रह के बीच कैसे तालमेल बिठाता है कि वह किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा। ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' और 'डील-मेकिंग' की मिश्रित शैली क्या इस बार सफल होगी?

क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक समझौता अनिवार्य प्रतीत होता है, लेकिन क्या ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम और इज़राइल अपनी सुरक्षा मांगों पर समझौता करेंगे?

एक बड़ा सवाल विचारणीय है: क्या ट्रंप की नई 'डील मेकिंग' शैली मध्य-पूर्व में दशकों पुराने संघर्ष को समाप्त कर पाएगी, या क्षेत्रीय दबाव और 'विघ्नसंतोषी' ताकतें एक बार फिर कूटनीति पर भारी पड़ेंगी?

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