अक्सर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को पुत्राजया के ठंडे गलियारों, सख्त प्रोटोकॉल और भारी-भरकम फाइलों के चश्मे से देखा जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया मलेशिया यात्रा ने एक अलग ही कहानी बयां की—जहाँ कूटनीति की मेज पर केवल फाइलें नहीं, बल्कि पुरानी फिल्मों की यादें और साझा विरासत भी मौजूद थी। यह यात्रा केवल व्यापारिक आंकड़ों के बारे में नहीं थी, बल्कि दो राष्ट्रों के बीच के 'विशेष संबंधों' को एक गहरी मानवीय और सांस्कृतिक धुरी पर ले जाने की कोशिश थी।
प्रधानमंत्री की इस यात्रा से निकले ये 5 सबक हमें बताते हैं कि भविष्य की वैश्विक राजनीति अब केवल समझौतों से नहीं, बल्कि 'विश्वास' और 'विरासत' से संचालित होगी।
1. कूटनीति और सिनेमा: साझा तमिल पहचान का जादू
इस यात्रा का सबसे भावुक और रणनीतिक मोड़ तब आया जब कुआलालंपुर में एक आधिकारिक लंच के दौरान 1975 की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'नालाई नमधे' (Naalai Namadhe) का गाना गूंजा। जब मलेशियाई पीएम अनवर इब्राहिम और पीएम मोदी ने महान एमजीआर (MGR) के प्रति अपने साझा प्रेम को स्वीकार किया, तो यह केवल एक संगीत संध्या नहीं रह गई।
मलेशिया में भारतीय मूल के लोगों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है, जिनमें से अधिकांश तमिल हैं। एमजीआर के प्रति यह दीवानगी उस साझा तमिल विरासत का प्रतीक है जो भारत को मलेशिया के साथ एक अटूट सूत्र में बांधती है। यह 'सॉफ्ट पावर' का वह रूप है जहाँ सिनेमा कूटनीति के लिए जमीन तैयार करता है।
"मेरे मित्र पीएम अनवर इब्राहिम द्वारा आयोजित दोपहर के भोजन में, महान एमजीआर की फिल्म का गाना 'नालाई नमधे' गाया गया! पीएम अनवर इब्राहिम, भारत में हम में से कई लोगों की तरह, एमजीआर के बड़े प्रशंसक हैं!" — पीएम नरेंद्र मोदी
2. विश्वास: भारत की नई वैश्विक 'करेंसी'
पीएम मोदी ने इस यात्रा के दौरान अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा, "आज विश्वास भारत की सबसे मजबूत करेंसी बन गया है।" यह बयान भारत की 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) और उसकी बढ़ती साख को रेखांकित करता है।
भारत अब केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक 'विश्वसनीय विकास भागीदार' (Trusted Partner for Growth) के रूप में उभरा है। इसकी गवाही हाल के व्यापारिक समझौते देते हैं, जो भारत ने केवल पश्चिमी देशों (यूके, अमेरिका, ईयू) के साथ ही नहीं, बल्कि यूएई, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ भी किए हैं। इस 'ट्रस्ट' का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दोनों देश अब सीमा पार गतिविधियों के लिए स्थानीय मुद्रा में व्यापार (Local-currency settlement) को बढ़ावा देने पर सहमत हुए हैं। पिछले साल का द्विपक्षीय व्यापार 18.6 बिलियन डॉलर को पार कर चुका है, जो इस भरोसे की मजबूती को दर्शाता है।
3. सेमीकंडक्टर्स और AI: 'आपूर्ति श्रृंखला' का रणनीतिक विस्तार
यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित 11 समझौतों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सेमीकंडक्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीक की साझेदारी है। यह केवल व्यापार का विस्तार नहीं है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में "डी-रिस्किंग" (De-risking) की एक बड़ी कोशिश है।
मलेशिया और भारत अब भविष्य की तकनीक पर एक रणनीतिक निर्भरता बना रहे हैं। यह साझेदारी दोनों देशों को पारंपरिक क्षेत्रों से आगे ले जाकर डिजिटल युग के सबसे संवेदनशील हिस्सों—जैसे चिप निर्माण और डेटा सुरक्षा—में एक-दूसरे का पूरक बनाती है। यह कदम यह सुनिश्चित करता है कि दोनों देश आने वाले समय में तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और सुरक्षित रहें।
4. 'लिविंग ब्रिज' और विरासत का सम्मान: सबाह से यूनिवर्सिटी ऑफ मलाया तक
मलेशिया में रहने वाले भारतीय प्रवासी दोनों देशों के बीच एक 'जीवित सेतु' (Living bridge) हैं। पीएम मोदी ने इस संबंध को नया आयाम देते हुए न केवल 'थिरुवल्लुवर छात्रवृत्ति' की घोषणा की, बल्कि यूनिवर्सिटी ऑफ मलाया में 'थिरुवल्लुवर चेयर' और एक नए 'थिरुवल्लुवर केंद्र' की स्थापना का भी जिक्र किया।
कूटनीतिक रूप से एक और बड़ी खबर यह रही कि मलेशिया ने बोर्नियो द्वीप पर सबाह (Sabah) में भारत का नया वाणिज्य दूतावास (Consulate) खोलने के प्रयासों का समर्थन किया है। इसके साथ ही, आजाद हिंद फौज (INA) के वयोवृद्ध अनुभवी जेयराज राजा राव से पीएम की मुलाकात ने उस साझा इतिहास को जीवंत कर दिया, जिसने दोनों देशों के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी आहुति दी थी।
5. आतंकवाद पर सख्त संदेश: कोई दोहरा मापदंड नहीं
जहाँ एक ओर सांस्कृतिक कोमलता दिखी, वहीं सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों पर भारत का रुख अडिग रहा। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा सहयोग अब खुफिया जानकारी साझा करने और समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ और अधिक व्यापक होगा। आतंकवाद के मुद्दे पर उनका संदेश स्पष्ट था कि वैश्विक शांति के लिए अब ढुलमुल रवैये की कोई जगह नहीं है।
"आतंकवाद पर हमारा संदेश स्पष्ट है; कोई दोहरा मापदंड नहीं, कोई समझौता नहीं।"
निष्कर्ष
पीएम मोदी की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि 2024 में स्थापित 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' (Comprehensive Strategic Partnership) अब जमीन पर उतर रही है। भारत और मलेशिया के संबंध अब उस नए युग में हैं जहाँ आर्थिक लाभ और सांस्कृतिक गौरव साथ-साथ चलते हैं।
अंत में एक विचारणीय प्रश्न: क्या आधुनिक भू-राजनीति में वास्तव में सांस्कृतिक समानताएं किसी भी आर्थिक समझौते से अधिक टिकाऊ और शक्तिशाली हो सकती हैं? जिस तरह से 'एमजीआर' के एक गाने ने दो बड़े नेताओं के बीच विश्वास की नई इबारत लिखी, वह भविष्य की कूटनीति के लिए एक नया और दिलचस्प सबक है।
