फरवरी 2026 में मस्कट-ओमान अक्ष (Muscat-Oman axis) वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गया है, जहाँ ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर हो रही चर्चाओं ने एक गहरा 'कूटनीतिक विरोधाभास' (diplomatic paradox) पैदा कर दिया है। एक ओर जहाँ मस्कट की मेज पर 'सकारात्मक' वार्ता के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समुद्र में गरजते विमानवाहक पोत एक अलग ही खतरे का संकेत दे रहे हैं। एक वरिष्ठ भू-राजनीतिक विश्लेषक के रूप में, इस स्थिति को केवल शांति वार्ता के चश्मे से देखना भूल होगी; यह 'दोहरी रणनीति' (dual strategy) और सैन्य दबाव का एक ऐसा जटिल जाल है, जहाँ कूटनीति की चादर के नीचे युद्ध की तैयारियां छिपी हैं। क्या यह वास्तव में शांति की ओर एक ठोस कदम है, या केवल एक बड़े क्षेत्रीय तूफान से पहले की भयावह खामोशी?
यहाँ इस संकट के 5 सबसे चौंकाने वाले और तकनीकी पहलू दिए गए हैं:
'परमाणु बम' की नई परिभाषा—सॉवरेनिटी (Sovereignty) के रूप में संवर्धन
ईरान के लिए यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) का मुद्दा अब केवल तकनीकी ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने स्पष्ट किया है कि ईरान का रुख 'परमाणु अप्रसार संधि' (NPT) में निहित अधिकारों पर आधारित है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसे 'राष्ट्रीय स्वतंत्रता' के प्रतीक के रूप में परिभाषित किया है, जिसका अर्थ है कि ईरान किसी भी महाशक्ति से आदेश लेने को तैयार नहीं है।
अराघची ने संवर्धन को अपनी संप्रभुता का मुख्य आधार बताते हुए कहा:
"वे हमारे परमाणु बम से डरते हैं, जबकि हम उसे नहीं खोज रहे हैं। हमारा परमाणु बम महान शक्तियों को 'ना' कहने की शक्ति है।"
यह विश्लेषण दर्शाता है कि ईरान संवर्धन को एक तकनीकी आवश्यकता से अधिक एक 'राजनीतिक ढाल' मानता है। उनके अनुसार, संवर्धन का अधिकार छोड़ना अपनी स्वायत्तता को गिरवी रखने जैसा है, जिसे वे युद्ध की स्थिति में भी स्वीकार नहीं करेंगे।
'सुंदर आर्मडा' बनाम ईरानी बेखौफ अंदाज
अमेरिकी रणनीति इस समय 'शक्ति के माध्यम से शांति' (Peace through strength) के सिद्धांत पर टिकी है। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा तैनात USS अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत, जिसे उन्होंने 'सुंदर आर्मडा' (Beautiful Armada) कहा है, वर्तमान में खाड़ी के पास तैनात है। इस सैन्य प्रदर्शन की गंभीरता तब और बढ़ गई जब अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और वरिष्ठ सलाहकार जारेड कुशनर ने खुद इस पोत का दौरा कर अपनी सैन्य तत्परता का जायजा लिया।
इस मनोवैज्ञानिक युद्ध पर प्रतिक्रिया देते हुए अराघची ने इसे 'शक्ति का खोखला प्रदर्शन' करार दिया। उन्होंने तकनीकी स्पष्टता के साथ कहा कि ईरान ऐसी सैन्य तैनातियों से डरने वाला नहीं है और "मौजूदा स्थिति में डरना एक घातक जहर के समान है।" यह रुख स्पष्ट करता है कि ईरान अमेरिकी 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति को कूटनीतिक मेज पर अपनी कमजोरी नहीं बनने देना चाहता।
मेज पर बातचीत, जेब पर वार—प्रतिबंधों का दोहरा खेल
मस्कट में ओमान की मध्यस्थता में हुई वार्ताओं को पेज़ेशकियन ने "एक कदम आगे" बताया है, लेकिन ठीक उसी समय अमेरिका ने आर्थिक मोर्चे पर प्रहार और तेज कर दिए हैं। अमेरिका की यह 'दोहरी नीति' कूटनीति की गंभीरता पर सवाल उठाती है। वार्ता के सकारात्मक संकेतों के बीच ट्रंप प्रशासन ने निम्नलिखित तीन कड़े कदम उठाए हैं:
- नया टैरिफ आदेश: ट्रंप ने उन देशों पर नए टैरिफ लगाने के कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, जो ईरान के साथ व्यापारिक संबंध जारी रखे हुए हैं।
- शिपिंग और तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध: विशेष रूप से ईरानी तेल निर्यात में शामिल शिपिंग संस्थाओं और जहाजों को लक्षित करते हुए नए प्रतिबंध लागू किए गए हैं।
- सैन्य और आर्थिक नाकेबंदी: वार्ता के समांतर ही सैन्य बढ़त को बढ़ाना और ईरान की आर्थिक जीवन रेखा को पूरी तरह अवरुद्ध करने का प्रयास करना।
'200 खाली स्कूल डेस्क'—वार्ता के पीछे की हृदयविदारक वास्तविकता
इस कूटनीतिक रस्साकशी के पीछे की सबसे 'हृदयविदारक वास्तविकता' (heart-wrenching reality) वह मानवीय त्रासदी है, जिसे अक्सर मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं मिलती। ईरान के भीतर आर्थिक बदहाली और महंगाई के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में भारी रक्तपात हुआ है। विशेष रूप से 8 और 9 जनवरी की रातों में हुई हिंसा ने देश को झकझोर कर रख दिया है।
इस त्रासदी का सबसे मार्मिक चेहरा '200 खाली स्कूल डेस्क' वाला वीडियो है, जो उन स्कूली बच्चों की याद में जारी किया गया जो इन प्रदर्शनों में मारे गए। मृतकों के आंकड़ों में गहरा विरोधाभास है:
- ईरानी सरकार का दावा: सरकार ने 3,117 मौतों की पुष्टि की है, लेकिन उनका तर्क है कि इनमें से अधिकांश सुरक्षाकर्मी और राहगीर (bystanders) थे।
- मानवाधिकार संगठनों का आंकलन: मानवाधिकार संस्था HRANA ने लगभग 7,000 मौतों का दस्तावेजीकरण किया है।
- संयुक्त राष्ट्र (UN) की चेतावनी: संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत के अनुसार, इंटरनेट पाबंदियों के बीच छन कर आ रही जानकारी के मुताबिक यह संख्या 20,000 तक हो सकती है।
यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही परमाणु वार्ता के पीछे एक ऐसा समाज है जो आंतरिक अस्थिरता और अपूरणीय क्षति के दौर से गुजर रहा है।
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क्षेत्रीय विनाश की चेतावनी—'प्रगति वर्षों पीछे चली जाएगी'
ईरान के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल अब्दुलराहीम मौसवी ने एक तकनीकी और रणनीतिक चेतावनी जारी की है। उनका तर्क है कि ईरान लंबी अवधि के युद्ध के लिए सक्षम और तैयार है, लेकिन यदि हमला हुआ तो इसका हर्जाना केवल ईरान को नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र को भुगतना होगा।
मौसवी के अनुसार, युद्ध की स्थिति में मध्य पूर्व (West Asia) की विकास यात्रा और प्रगति के दशकों पुराने प्रयास 'वर्षों पीछे' चले जाएंगे। यह बयान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत देता है कि ईरान की रक्षा नीति अब केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय रूप से विनाशकारी प्रतिशोध पर आधारित है।
निष्कर्ष
ईरान और अमेरिका के बीच ओमान में शुरू हुई यह वार्ता निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण मोड़ है, लेकिन प्रतिबंधों की बढ़ती कड़वाहट और 'सुंदर आर्मडा' की रणनीतिक तैनाती इस रास्ते को जोखिम भरा बनाती है। जहाँ एक तरफ संप्रभुता और NPT अधिकारों की रक्षा की जिद है, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक और सैन्य घेराबंदी। इन सबके बीच पिस रहा वह आम नागरिक है, जिसकी नियति इन बंद कमरों में होने वाले फैसलों पर टिकी है।
अंतिम विचार: क्या कूटनीति और 'सुंदर आर्मडा' के इस दौर में असली जीत शांति की होगी, या इतिहास खुद को एक बार फिर दोहराने की कगार पर है?

