ट्रंप का दावा और जयशंकर का 'पावर गेम': क्या वाकई भारत छोड़ देगा रूसी तेल?

फरवरी 2026 की उस बर्फीली सुबह म्यूनिख के होटल बायरिशर होफ (Bayerischer Hof) में मौजूद डिप्लोमेट्स और वैश्विक पत्रकारों के फोन अचानक 'पिंग' (ping) होने लगे। कूटनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार गर्म था, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'TRUTH Social' पर एक 'ऐतिहासिक' घोषणा कर दी थी। ट्रंप का दावा था कि भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा ट्रेड पैक्ट (trade pact) हुआ है, जिसके तहत भारत अब रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा। इस एक पोस्ट ने न केवल म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC 2026) के एजेंडे को बदल दिया, बल्कि दुनिया के ऊर्जा बाजारों में भी भारी 'सस्पेंस' पैदा कर दिया।

म्यूनिख में उस समय माहौल किसी 'जियोपॉलिटिकल थ्रिलर' (Geopolitical thriller) जैसा था। एक तरफ वाशिंगटन से आ रहे बड़े दावों का दबाव था, तो दूसरी तरफ भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) का सवाल। जैसे ही भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर मंच पर आए, पूरी दुनिया यह जानने को बेताब थी कि क्या 'नया भारत' पश्चिमी दबाव के आगे झुक गया है या फिर वह अपनी उस 'डिप्लोमेसी' पर अडिग है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में उसे एक वैश्विक 'पावर प्लेयर' के रूप में स्थापित किया है।

यह केवल तेल की खरीद का मामला नहीं था; यह 'न्यू इंडिया' की उस स्वतंत्र सोच की परीक्षा थी, जो आज के दौर के 'जियोपॉलिटिकल चर्न' (Geopolitical churn) में अपनी राह खुद तलाश रही है। जयशंकर के सधे हुए शब्दों और उनके 'पावर गेम' ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की कूटनीति अब किसी 'जीरो-सम गेम' (Zero-sum game) का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की एक कला है।

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डोनाल्ड ट्रंप का 'ऐतिहासिक' दावा बनाम भारत की चुप्पी

डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी चिर-परिचित 'ट्रैन्ज़ैक्शनल डिप्लोमेसी' (transactional diplomacy) का परिचय देते हुए 'TRUTH Social' पर दावा किया कि एक नई व्यापारिक संधि के तहत भारत ने रूसी कच्चे तेल को "अलविदा" कहने का फैसला किया है। ट्रंप के लिए यह उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति की एक बड़ी प्रतीकात्मक जीत थी, जिसका उद्देश्य रूस की आय के स्रोतों पर प्रहार करना और भारत को पूरी तरह से पश्चिमी सुरक्षा और आर्थिक ढांचे के भीतर लाना था।

हालांकि, कूटनीति में जो कहा जाता है और जो होता है, उसके बीच अक्सर एक बड़ी खाई होती है। ट्रंप की इस एकतरफा (unilateral) घोषणा के बावजूद, भारत की ओर से 'आधिकारिक पुष्टि का अभाव' (lack of official confirmation) सबसे चौंकाने वाला पहलू रहा। नई दिल्ली ने इस तथाकथित 'स्टॉप' (stop) पर रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है, जो यह संकेत देता है कि शायद पर्दे के पीछे की कहानी उतनी सरल नहीं है जितनी ट्रंप इसे पेश कर रहे हैं।

"भारत एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल की खरीद बंद करने पर सहमत हो गया है।" — डोनाल्ड ट्रंप के 'TRUTH Social' पोस्ट का सार

'Strategic Autonomy' – भारत के डीएनए में बसी आजादी

म्यूनिख के मंच पर जब जयशंकर से सीधा सवाल किया गया कि क्या भारत को रूसी तेल से "अलग होने" (wean off) के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो उन्होंने अपनी चिर-परिचित शैली में जवाब दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की नीति के साथ "शादीशुदा" (wedded) है।

रणनीतिक स्वायत्तता का ऐतिहासिक विकास विदेश मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि यह स्वायत्तता कोई अस्थायी नीति या केवल एक 'बजवर्ड' (buzzword) नहीं है। यह भारत के 'डीएनए' का हिस्सा है, जो हमारे इतिहास और हमारे विकास (evolution) से उपजा है। जयशंकर का विश्लेषण गहरा था; उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नीति किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय राजनीतिक स्पेक्ट्रम (political spectrum) में रची-बसी है। उनका संदेश साफ था: भारत की निर्णय लेने की क्षमता को कोई भी व्यापारिक समझौता या बाहरी दबाव बंधक नहीं बना सकता।

तेल का खेल – बाजार के तर्क या दबाव की राजनीति?

वैश्विक ऊर्जा बाजार को जयशंकर ने "जटिल" (complex) करार देते हुए इसे विशुद्ध आर्थिक नजरिए से देखने की बात कही। उन्होंने यह तर्क दिया कि तेल की खरीद को अक्सर राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, जबकि हकीकत में यह बाजार की शक्तियों (market forces) का खेल है।

प्रैग्मैटिक बिजनेस डिसीजन (Pragmatic Business Decision) भारत के लिए तेल की खरीद एक 'प्रैग्मैटिक बिजनेस डिसीजन' है। जयशंकर ने यूरोप को आईना दिखाते हुए कहा कि तेल कंपनियां—चाहे वे भारत की हों, यूरोप की या कहीं और की—वे उपलब्धता, लागत और जोखिमों के आधार पर फैसले लेती हैं। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता, क्योंकि उसके करोड़ों नागरिकों की आर्थिक स्थिति सीधे तौर पर सस्ती ऊर्जा से जुड़ी है।

"भारत, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों की तेल कंपनियां उपलब्धता को देखती हैं, लागत को देखती हैं, जोखिमों को देखती हैं और फिर वे निर्णय लेती हैं जो उन्हें अपने सर्वोत्तम हित में लगते हैं।" — एस. जयशंकर

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म्यूनिख में 'इंडिपेंडेंट माइंडेड' भारत का कड़ा संदेश

जर्मन विदेश मंत्री जोहान वेडफुल के साथ एक इंटरैक्टिव सत्र में जयशंकर ने वह कहा जो अक्सर पश्चिमी राजनेताओं को रास नहीं आता। उन्होंने स्वीकार किया कि भारत एक 'Independent-minded' देश है और वह ऐसे विकल्प चुन सकता है जो शायद पश्चिम की सोच या उनके रणनीतिक हितों से मेल न खाते हों।

कॉमन ग्राउंड और सहमति का गणित जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत और पश्चिम के बीच हमेशा हर मुद्दे पर 100% सहमति होना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने 'Common ground' और 'ओवरलैप्स' (overlaps) की बात तो की, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ दिया कि अगर हमारे फैसले आपके विचारों से मेल नहीं खाते, तो "हाँ, ऐसा हो सकता है।" यह बयान 'डी-रिस्किंग' (De-risking) के इस दौर में भारत की उस दृढ़ता को दर्शाता है जहाँ वह किसी के 'जूनियर पार्टनर' के रूप में नहीं, बल्कि एक बराबर के भागीदार के रूप में अपनी बात रखता है।

G7 के साथ मंथन और UN80 का एजेंडा

सम्मेलन के दौरान जयशंकर ने G7 देशों के विदेश मंत्रियों के साथ भी गहन विचार-विमर्श किया। इस चर्चा का केंद्र 'UN80' एजेंडा और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में "अर्थपूर्ण सुधार" (meaningful reform) की मांग थी। भारत का तर्क है कि 1945 की व्यवस्था 2026 की वास्तविकताओं को नहीं संभाल सकती। भारत आज खुद को केवल एक 'खिलाड़ी' के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के एक रक्षक और एक विश्वसनीय स्तंभ के रूप में देख रहा है, जो दुनिया की शीर्ष मेज पर अपनी जगह का हकदार है।

दुनिया को लगे पांच बड़े झटके और भारत की चेतावनी

जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था की विफलता को समझाने के लिए पिछले पांच वर्षों में दुनिया द्वारा झेले गए पांच बड़े संकटों का उल्लेख किया। उन्होंने तर्क दिया कि ये 'झटके' यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अपरिहार्य मजबूरी है।

वैश्विक व्यवस्था को हिला देने वाले पांच झटके:

  1. COVID-19 महामारी: जिसने वैश्विक स्वास्थ्य और सप्लाई चेन की नाजुकता को उजागर किया।
  2. यूक्रेन संघर्ष: जिसने वैश्विक ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगा दिया।
  3. मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव: जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।
  4. चीन का उदय: जिसने पारंपरिक शक्ति संतुलन को पूरी तरह से बदल दिया है।
  5. वैश्विक प्रणालियों पर पड़ता गहरा प्रभाव (Impact on global systems): जिसमें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का इन संकटों को रोकने में नाकाम रहना शामिल है।

जयशंकर के अनुसार, ये "गहन परिवर्तन" (profound changes) इशारा करते हैं कि दुनिया का वर्तमान ढांचा चरमरा चुका है।

क्यों यह खबर दिखने में जितनी बड़ी है, उससे कहीं ज्यादा गहरी है?

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक ही सवाल है: क्या भारत वास्तव में रूसी तेल छोड़ रहा है? लेकिन जयशंकर के बयानों की बारीक परतों को टटोलें, तो यह सवाल ही अधूरा लगता है। भारत की असली रणनीति "रूसी तेल" या "अमेरिकी तेल" के बीच चयन करने की नहीं है, बल्कि अपनी "चुनाव करने की स्वतंत्रता" (freedom to choose) को बचाए रखने की है।

डोनाल्ड ट्रंप का दावा एक क्लासिक अमेरिकी दबाव तकनीक हो सकती है। ट्रंप प्रशासन व्यापारिक समझौतों को रणनीतिक वफादारी के साथ जोड़कर देखना चाहता है। लेकिन जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत की कूटनीति 'स्वतंत्र' है। भारत अपनी कूटनीति को 'ओवरलैप' (overlaps) के सिद्धांतों पर चला रहा है। इसका मतलब है कि भारत अमेरिका के साथ 'ऐतिहासिक' व्यापारिक समझौते भी कर सकता है और साथ ही अपनी तेल कंपनियों को वह करने की छूट भी दे सकता है जो "उनके सर्वोत्तम हित में" (in their best interest) हो।

यहाँ मुख्य विरोधाभास यह है कि पश्चिम जिसे "मजबूरी" (forced) कहता है, भारत उसे "व्यावसायिक स्वायत्तता" कहता है। जब जयशंकर कहते हैं कि तेल कंपनियां लागत और जोखिम को देखती हैं, तो वह एक सीधा संदेश दे रहे हैं: अगर अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करे, तो उसे रूसी तेल से बेहतर और सस्ता विकल्प बाजार में उतारना होगा। भारत दबाव में आकर अपने नागरिकों के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाएगा। यह 'न्यू इंडिया' की विदेश नीति का नया व्याकरण है—जहाँ राष्ट्र हित किसी भी 'वैचारिक गुटबाजी' से बड़े हैं।

आगे की राह और वैश्विक ऊर्जा समीकरण

आने वाले महीनों में भारत-अमेरिका व्यापारिक समझौता एक नए चरण (new phase) में प्रवेश करने वाला है। यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए नए रास्ते खोलेगा, लेकिन क्या इसके बदले भारत रूस से पूरी तरह नाता तोड़ लेगा? इसकी संभावना कम है।

यह संभव है कि भारत रूस से तेल की खरीद को धीरे-धीरे कम करे, लेकिन यह किसी अमेरिकी 'डिक्टेट' (dictate) पर नहीं, बल्कि बाजार की उपलब्धता और अपनी ऊर्जा टोकरी (energy basket) को विविधता देने की रणनीति का हिस्सा होगा। वैश्विक ऊर्जा समीकरण अब केवल राजनीति से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थिरता से तय होंगे। भारत की 'स्वतंत्र सोच' (Independent-mindedness) उसे इस 'जियोपॉलिटिकल चर्न' में डूबने से बचाएगी और वह अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करते हुए भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा की चाबी अपने पास ही रखेगा।

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निष्कर्ष और विचार

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2026 में एस. जयशंकर का प्रदर्शन यह बताता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर केवल एक 'श्रोता' नहीं रह गया है। भारत अब वह देश नहीं है जो किसी की "मुफ्त सलाह" (free advice) को चुपचाप स्वीकार कर ले। जयशंकर का रुख 'ऑपरेशन सिंदूर' (Op Sindoor) जैसी मुखर और साहसी भारतीय नीति का प्रतिबिंब है, जो यह स्पष्ट करता है कि भारत की संप्रभुता और उसके आर्थिक हित किसी भी वैश्विक शक्ति के दावों से ऊपर हैं।

म्यूनिख की यह 'इनसाइड स्टोरी' हमें बताती है कि कूटनीति में कभी-कभी 'चुप्पी' भी एक बहुत बड़ा बयान होती है। ट्रंप के दावों के बीच जयशंकर की स्वायत्तता वाली बात ने साफ कर दिया है कि भारत अपने फैसले दिल्ली से लेगा, न कि वाशिंगटन या मॉस्को से।

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आप इस मुद्दे को कैसे देखते हैं? क्या भारत को अपने आर्थिक हितों के लिए रूसी तेल खरीदना जारी रखना चाहिए, या अमेरिका के साथ नए व्यापारिक रिश्तों के लिए इसे छोड़ देना चाहिए?

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