किम जोंग उन का वो खौफनाक सच, जिससे कांपती है पूरी दुनिया: क्या है प्योंगयांग की 'लोहे की दीवारों' का राज?
40 किलोमीटर लंबी लाशों की यात्रा और 6 महीने की जेल का फरमान। जानिए कैसे एक 'शर्मीला बच्चा' बन गया दुनिया का सबसे क्रूर तानाशाह, जिसने पूरी मानवता को न्यूक्लियर विनाश के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
बारूद की खेती, भूख से मरते लोग और अपने ही सगे-संबंधियों का खून पीने वाले किम राजवंश की वह खौफनाक इनसाइड स्टोरी, जिसे उत्तर कोरिया की सरकार दुनिया से हमेशा छिपाना चाहती है।
28 दिसंबर 2011: जब प्योंगयांग की सड़कों पर उतरा खौफ का समंदर
तारीख थी 28 दिसंबर 2011। उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग उस दिन सफेद बर्फ की एक बेहद मोटी चादर से ढकी हुई थी। हड्डियों को गला देने वाली कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे जा चुका था।
लेकिन उस बर्फीली और कंपा देने वाली दोपहर में भी प्योंगयांग की चौड़ी सड़कों पर लाखों लोगों का ऐसा जनसैलाब उमड़ा था, जिसे देखकर पूरी दुनिया के रोंगटे खड़े हो गए। विदेशी मीडिया के कैमरे इस नजारे को कैद कर रहे थे। ये कोई जश्न या खुशी का मौका नहीं था।
बल्कि, यह एक ऐसा खौफनाक मंजर था जो इतिहास के पन्नों में सिर्फ शोक नहीं, बल्कि 'स्टेट-स्पॉन्सर्ड हिस्टीरिया' (सरकार द्वारा प्रायोजित उन्माद) के नाम से दर्ज होने वाला था। सड़कों के दोनों किनारे मीलों तक इंसानों की दीवार खड़ी थी।
इस भीड़ में छोटे-छोटे मासूम बच्चे, कमजोर बूढ़े और भारी भरकम रोएदार जैकेट पहने महिलाएं शामिल थीं। जैसे ही काली पारंपरिक कारों का एक बेहद लंबा काफिला उस सड़क से गुजरना शुरू हुआ, उस बर्फीले सन्नाटे को चीरती हुई लाखों लोगों की चीखें एक साथ गूंज उठीं।
ये महिलाएं और पुरुष अपनी छाती पीट-पीट कर ऐसे रो रहे थे जैसे आसमान टूट पड़ा हो या उनका सब कुछ लुट गया हो। कई लोग तो रोते-रोते बेहोश होकर बर्फ पर गिर रहे थे। काफिले की तीसरी काली लिमोजीन कार की छत पर एक विशालकाय, मुस्कुराती हुई तस्वीर लगी थी।
यह तस्वीर किसी और की नहीं, बल्कि उत्तर कोरिया के दूसरे तानाशाह, 'डियर लीडर' किम जोंग इल की थी। 11 दिन पहले एक सीक्रेट रेल यात्रा के दौरान उन्हें अचानक मैसिव हार्ट अटैक आया था, जिससे उनकी मौत हो गई थी।
- शक्ति का खौफनाक प्रदर्शन: 40 किलोमीटर लंबी यह शव यात्रा केवल एक पिता की अंतिम विदाई नहीं थी, बल्कि सत्ता के नए वारिस की ताकत का क्रूर ट्रेलर था।
- रोना एक सरकारी ड्यूटी: फरमान जारी हुआ था कि जिस भी नागरिक की आंखों में आंसू नहीं दिखेंगे, उसे तुरंत गिरफ्तार कर 6 महीने के लिए कठोर लेबर कैंप में भेज दिया जाएगा।
- दुनिया के लिए एक सरप्राइज: किसी को अंदाजा नहीं था कि किम जोंग इल के बाद सत्ता की कमान एक 27 साल के अनुभवहीन लड़के को सौंप दी जाएगी।
- ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स में भूचाल: इसी घटना के बाद दुनिया को न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग के एक नए और सबसे खतरनाक युग का सामना करना पड़ा।
रोने की एक्टिंग या मौत: उत्तर कोरिया का वो क्रूर फरमान
करीब 40 किलोमीटर लंबी यह शव यात्रा महज एक इवेंट नहीं थी। यह किम राजवंश के तीसरे वारिस, किम जोंग उन की शक्ति का पहला सीधा प्रदर्शन था। दुनिया को लग रहा था कि लोग अपने नेता के जाने के गम में रो रहे हैं, लेकिन 'ग्राउंड रियलिटी' रूह कंपा देने वाली थी।
उत्तर कोरिया की सीक्रेट पुलिस और सेना के जवान सादे कपड़ों में भीड़ के बीच मौजूद थे। सरकार की तरफ से बेहद सख्त और गुप्त आदेश जारी किए गए थे। आदेश यह था कि जो व्यक्ति इस राष्ट्रीय शोक में शामिल नहीं होगा, या रोने में कोताही बरतेगा, उसे देशद्रोही माना जाएगा।
सजा के तौर पर ऐसे लोगों को सीधे 6 महीने के लिए उन कुख्यात 'गुलाग' (लेबर कैंप) में भेज दिया जाएगा, जहां से इंसान जिंदा वापस नहीं लौटता। वहां रोना कोई मानवीय जज्बात नहीं रह गया था, बल्कि यह हर नागरिक की एक अनिवार्य सरकारी ड्यूटी बन चुकी थी।
दुनिया इस खौफनाक दृश्य को अपने टीवी स्क्रीन पर देख ही रही थी कि तभी उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया KCNA (कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी) ने एक ऐसी घोषणा की जिसने ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स का रुख हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
51 घंटों तक अपने पिता की मौत को सबसे बड़ा राष्ट्रीय राज बनाए रखने के बाद, टीवी स्क्रीन पर काली पारंपरिक पोशाक पहने एक बुजुर्ग महिला एंकर नजर आई। उसने कांपती हुई लेकिन बेहद दृढ़ आवाज में रोते हुए ऐलान किया—"हमारे अगले सुप्रीम लीडर होंगे महान कामरेड किम जोंग उन।"
पूरी दुनिया की खुफिया एजेंसियों के लिए यह नाम बिल्कुल नया और चौंकाने वाला था। उस वक्त तक न किसी ने इस लड़के की आवाज सुनी थी, न ही किसी ने इसका चेहरा ठीक से देखा था। यह एक ऐसा रहस्यमयी चेहरा था जो आने वाले सालों में दुनिया का सबसे खूंखार तानाशाह बनने वाला था।
| उत्तर कोरिया के शासक (किम राजवंश) | शासनकाल और उनकी क्रूर विरासत |
|---|---|
| किम इल-सुंग (Kim Il-sung) | (1948 - 1994) उत्तर कोरिया के संस्थापक। इन्होंने तानाशाही की नींव रखी और खुद को 'ईश्वर' के रूप में स्थापित किया। |
| किम जोंग इल (Kim Jong Il) | (1994 - 2011) किम जोंग उन के पिता। इनके शासन में भयानक अकाल आया जिसमें लाखों मरे, लेकिन इन्होंने सेना को ताकतवर बनाया। |
| किम जोंग उन (Kim Jong Un) | (2011 - वर्तमान) वर्तमान तानाशाह। न्यूक्लियर प्रोग्राम को चरम पर पहुंचाया और क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। |
खून का बंटवारा: 38वीं समानांतर रेखा और 'जिंदा जख्म' का इतिहास
आखिर उत्तर कोरिया ऐसा कैसे बन गया? इस सवाल का जवाब खोजने और कोरिया की इस खूनी कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे इतिहास की गलियों में जाना होगा। आज भले ही हमें वर्ल्ड मैप पर नॉर्थ और साउथ कोरिया दो एकदम अलग-अलग और कट्टर दुश्मन देश दिखते हैं, लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था।
साल 1948 से पहले ये दोनों देश एक ही थे—'यूनाइटेड कोरिया'। इस पूरे कोरियाई प्रायद्वीप पर सदियों तक शिला और जोसियन वंश का शासन रहा था। इन राजवंशों को सदियों से पड़ोसी चीन के ताकतवर चिंग वंश का पूरा समर्थन हासिल था और यहां शांति थी।
लेकिन 19वीं सदी के अंत में एशिया का पूरा गेम बदल गया। जापान एक बेहद आक्रामक और उभरती हुई सैन्य 'सुपरपावर' बन चुका था। जापानी साम्राज्य की लालची नजरें कोरिया के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों पर गड़ी हुई थीं।
1894 में जापान ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए पहले चीन को एक बड़े युद्ध में हराया। फिर 1905 में तो उसने हद ही कर दी और रूस जैसी विशाल महाशक्ति को युद्ध के मैदान में धूल चटा दी। इस जीत ने जापान के हौसले आसमान पर पहुंचा दिए।
इसके बाद 1910 में एक जबरन संधि थोपी गई, जिसने पूरे कोरिया को आधिकारिक तौर पर जापान का गुलाम बना दिया। ठीक उसी तरह, जैसे हम भारतवासी लगभग 200 सालों तक अंग्रेजों के गुलाम रहे, कोरियाई जनता भी जापानी साम्राज्यवाद की भयानक क्रूरता के साये में जीने को मजबूर हो गई।
| बंटवारे से पहले और बाद का कोरिया | मुख्य ऐतिहासिक बदलाव |
|---|---|
| जापानी शासन (1910-1945) | कोरियाई भाषा पर बैन, क्रूर अत्याचार और संसाधनों की खुली लूट। |
| 1945 का वो मनहूस दिन | दो अमेरिकी अधिकारियों ने नक्शे पर एक लाइन (38th Parallel) खींचकर देश को दो हिस्सों में बांट दिया। |
| कोरियाई युद्ध (1950-1953) | उत्तर ने दक्षिण पर हमला किया। लाखों लोग मारे गए। आज तक कोई शांति समझौता नहीं हुआ, सिर्फ युद्धविराम है। |
"उत्तर कोरिया एक देश नहीं, बल्कि 2.5 करोड़ लोगों की एक खुली जेल है, जहां जेलर खुद को भगवान मानता है और कैदियों को उसे पूजने की सजा दी जाती है।"
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विश्लेषक38th Parallel: नक्शे पर खिंची वो खूनी लकीर जिसने देश को फाड़ दिया
कोरियाई जनता के लिए असली ड्रामा और त्रासदी द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के अंतिम दिनों में शुरू हुई। 1945 में जब अमेरिका ने जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, तो जापान का घमंड टूट गया और उसने बिना शर्त घुटने टेक दिए।
जापान के सरेंडर करते ही उसके सारे उपनिवेश तुरंत छिन गए। कोरिया को जापानी जुल्मों से आजादी तो मिली, लेकिन यह आजादी एक नए और कभी न खत्म होने वाले दर्द की शुरुआत थी। कोरिया अब दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों—अमेरिका और सोवियत संघ (रूस)—की विचारधारा की जंग (कोल्ड वॉर) का पहला अखाड़ा बन गया।
रूस ने अपनी लाल सेना के साथ उत्तर की तरफ से कोरिया पर कब्जा जमाया, और अमेरिका ने दक्षिण की ओर से अपनी फौजें उतार दीं। बिना वहां की जनता से पूछे, बिना किसी भौगोलिक या सांस्कृतिक तर्क के, नक्शे पर एक काल्पनिक रेखा खींच दी गई। इसे '38th Parallel' (38वीं समानांतर रेखा) कहा गया।
यह रेखा सिर्फ एक बॉर्डर नहीं थी। यह इंसानियत को बांटने वाली एक वैचारिक दीवार थी। उत्तर में रूस ने कठोर कम्युनिज्म (साम्यवाद) का लाल परचम लहराया, तो दक्षिण में अमेरिका ने कैपिटलिज्म (पूंजीवाद) और लोकतंत्र का बीज बोया। एक ही खून रातों-रात दो पक्के दुश्मनों में बंट गया।
रूस के तत्कालीन क्रूर तानाशाह जोसेफ स्टालिन ने उत्तर कोरिया को कंट्रोल करने के लिए एक पूर्व गोरिल्ला लड़ाकू को चुना। उसका नाम था किम इल-सुंग। स्टालिन के आशीर्वाद से किम इल-सुंग उत्तर कोरिया का पहला 'सुप्रीम लीडर' बन बैठा और यहीं से किम राजवंश की नींव पड़ी।
किम इल-सुंग ने 48 सालों तक लगातार शासन किया। उसने तानाशाही और ब्रेनवाशिंग का वो खौफनाक 'ब्लूप्रिंट' तैयार किया, जिस पर आज उसका पोता किम जोंग उन चल रहा है। सुंग ने अपने शासन में जासूसों का एक ऐसा अदृश्य जाल बिछाया कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी पर नजर रखता था।
जो भी इंसान सरकार की नीतियों का हल्का सा भी विरोध करता, उसे रातों-रात गायब कर सीधे खदानों वाले लेबर कैंप भेज दिया जाता। वहां भूख और कोड़ों की मार से उनकी मौत हो जाती। यही वो 'Legacy of Fear' (खौफ की विरासत) है जो किम जोंग उन को अपने दादा और पिता से सीधे विरासत में मिली है।
'पाक उन' का रहस्य: स्विट्जरलैंड की खूबसूरत वादियों में पला तानाशाह
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना (Irony) देखिए दोस्तों। जो किम जोंग उन आज हर दिन अमेरिका, यूरोप और पश्चिमी सभ्यता को दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन बताता है, उसकी अपनी खुद की परवरिश उसी यूरोप के दिल में हुई है। उसका बचपन किसी बंद तहखाने में नहीं, बल्कि स्विट्जरलैंड की वादियों में गुजरा है।
किम जोंग उन के पिता, किम जोंग इल की निजी जिंदगी किसी अय्याश राजा जैसी थी। उनकी कई पत्नियां और अनगिनत प्रेमिकाएं थीं। किम जोंग उन की मां का नाम को-योंग-हुई (Ko Yong-hui) था। उन्हें आधिकारिक तौर पर किम जोंग इल की दूसरी मिस्ट्रेस या पत्नी माना जाता था।
किम जोंग उन की पैदाइश के साल को लेकर भी इंटरनेशनल मीडिया में एक अजीब सा रहस्य बना हुआ है। उत्तर कोरियाई सरकार के आधिकारिक दस्तावेज कहते हैं कि उनके महान नेता का जन्म 1982 में हुआ था।
वहीं, दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसियां (NIS) मजबूती से 1983 का दावा करती हैं। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब किम की अपनी मौसी (जो उनके साथ यूरोप में रहती थीं) ने अमेरिका के 'वाशिंगटन पोस्ट' अखबार को एक सीक्रेट इंटरव्यू दिया। उन्होंने बताया कि किम का असली जन्म साल 1984 है। सरकार ने उनकी उम्र इसलिए बढ़ाई ताकि वे जल्द ही 'परिपक्व' और सत्ता के लायक दिख सकें।
| स्विट्जरलैंड में किम का जीवन | उत्तर कोरियाई जनता का जीवन (उसी दौर में) |
|---|---|
| महंगे नाइके (Nike) के जूते और डिजाइनर कपड़े पहनना। | लाखों लोग भयानक अकाल (Arduous March) में घास खा रहे थे। |
| बास्केटबॉल खेलना, हॉलीवुड की फिल्में देखना और पिज्जा खाना। | विदेशी मीडिया या फिल्में देखने पर सरेआम फांसी दी जा रही थी। |
| स्विट्जरलैंड के महंगे प्राइवेट स्कूलों में बेहतरीन शिक्षा हासिल करना। | बच्चों को कम उम्र में ही सेना और खेतों में मजदूरी के लिए झोंका जा रहा था। |
स्विट्जरलैंड के वो गुमनाम साल: जब किम था सिर्फ एक 'शर्मीला बच्चा'
साल 1993 से 2000 के बीच, जब किम महज 12 साल के थे, उन्हें गुपचुप तरीके से अपनी पहचान छिपाकर स्विट्जरलैंड के खूबसूरत बर्न (Bern) शहर में पढ़ने के लिए भेजा गया। वहां स्कूल के रजिस्टर में उनका नाम किम जोंग उन नहीं, बल्कि 'पाक उन' या 'चोल पार्क' दर्ज था।
स्विस अथॉरिटीज और स्कूल को बताया गया कि यह लड़का वहां स्थित एक साधारण उत्तर कोरियाई राजनयिक का बेटा है। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि उनके साथ बेंच पर बैठने वाला यह गोल-मटोल बच्चा दुनिया के सबसे खतरनाक देश के तानाशाह का असली वारिस है।
वहां किम अपने बड़े भाई और अपनी मौसी के परिवार के साथ एक आलीशान घर में रहते थे। किम के स्कूल के दिनों के पुराने साथी आज भी जब मीडिया को इंटरव्यू देते हैं, तो उन्हें एक 'शर्मीले, शांत और बात-बात पर झेंप जाने वाले' लड़के के रूप में याद करते हैं।
उन्हें पढ़ाई-लिखाई या राजनीति से ज्यादा बास्केटबॉल का भयानक जुनून था। वे कोर्ट पर हमेशा नाइके (Nike) के ब्रांडेड जूते और महंगे वेस्टर्न कपड़े ही पहनते थे। वे अमेरिकी बास्केटबॉल टीम 'शिकागो बुल्स' और महान खिलाड़ी माइकल जॉर्डन के बहुत बड़े फैन थे। वे घंटों उनकी वीडियो टेप देखा करते थे।
लेकिन उस शर्मीलेपन और मासूमियत के पीछे एक बेहद 'जिद्दी और सनकी' बच्चा छिपा था, जो किसी की बात सुनना बर्दाश्त नहीं कर सकता था। उनकी मौसी बताती हैं कि जब उनकी मां उन्हें ज्यादा खेलने पर या पढ़ाई के लिए टोकती थीं, तो वे आम बच्चों की तरह पलटकर जवाब नहीं देते थे या चिल्लाते नहीं थे।
इसके बजाय, वे खाना-पीना छोड़ देते थे। वे कई-कई दिनों तक पूरी तरह मौन धारण कर लेते थे और अपनी मां से नजरें तक नहीं मिलाते थे। यह एक जिद्दी तानाशाह के शुरुआती लक्षण थे। वे जता देते थे कि उनके खिलाफ जाना किसी को भी भारी पड़ सकता है।
साल 2000 में किम अचानक स्कूल से गायब हो गए। वे बिना किसी को बताए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर वापस प्योंगयांग लौट आए। दुनिया के पश्चिमी विश्लेषकों को उस वक्त बड़ी उम्मीद थी। उन्हें लगा था कि यूरोप के खुले माहौल में पढ़ा-लिखा यह लड़का जब सत्ता में आएगा, तो उत्तर कोरिया में 'पिज्जा, इंटरनेट और डेमोक्रेसी' लेकर आएगा।
लेकिन उनकी ये उम्मीदें जल्द ही चकनाचूर हो गईं। 2011 में सत्ता संभालते ही किम जोंग उन ने सरकारी मीडिया के जरिए दुनिया के लिए एक कड़ा बयान जारी करवाया—"हमसे किसी भी तरह के 'नीतिगत बदलाव' या खुलेपन की उम्मीद मत रखना।" यह एक सीधी वैश्विक चेतावनी थी कि वह 'बास्केटबॉल का शौकीन लड़का' अब सीधे 'बैलिस्टिक मिसाइलों' से खेलने वाला है।
लोहे की मुट्ठी: अपनों के खून से सींचा गया किम जोंग उन का सिंहासन
दिसंबर 2011 में जब किम जोंग उन सत्ता के शिखर पर बैठे, तो उनकी उम्र महज 27 या 28 साल थी। एक ऐसे देश में जहां उम्र और तजुर्बे को भगवान माना जाता है, वहां सेना के 70-80 साल के बूढ़े जनरलों और दशकों से राजनीति कर रहे खुर्राट नेताओं के बीच एक नौजवान के लिए अपनी धाक जमाना कतई आसान नहीं था।
किम को हर तरफ अपने खिलाफ रची जा रही साजिशों की गंध आ रही थी। उसे डर था कि सेना के जनरल्स तख्तापलट (Coup) कर सकते हैं। इसलिए किम ने सत्ता के इस खूनी खेल को जीतने का सबसे पुराना, सबसे आजमाया हुआ और सबसे खौफनाक तरीका चुना—Internal Purging यानी 'आंतरिक सफाई' या कत्लेआम।
सबसे पहले उसने सेना के उन सभी वरिष्ठ अधिकारियों को एक-एक करके रहस्यमयी तरीके से हटाना शुरू किया जो उसके पिता के करीबी थे। कुछ रातों-रात गायब हो गए, कुछ रहस्यमयी कार एक्सीडेंट में मारे गए, और कुछ को भ्रष्टाचार के झूठे आरोपों में लेबर कैंप भेज दिया गया। लेकिन किम की क्रूरता का असली ट्रेलर अभी बाकी था।
- सगे फूफा का बेरहमी से कत्ल: अपनी कुर्सी बचाने के लिए किम ने अपने सबसे करीबी और ताकतवर रिश्तेदार को भी नहीं बख्शा।
- सौतेले भाई की विदेशी धरती पर हत्या: किम के हाथ इतने लंबे हो चुके थे कि उसने दूसरे देश के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर केमिकल वेपन का इस्तेमाल कर दिया।
- सेना में खौफ: छोटी सी गलती, जैसे मीटिंग में झपकी लेना, पर भी बड़े अधिकारियों को तोप से उड़ा दिया गया।
- सत्ता का एक ही नियम: उत्तर कोरिया में भगवान सिर्फ एक है, और वह है किम जोंग उन। जो इसके खिलाफ सोचेगा, उसका नामोनिशान मिटा दिया जाएगा।
सगे फूफा जांग सोंग-थेक की वो रूह कंपा देने वाली हत्या
जांग सोंग-थेक (Jang Song-thaek) सिर्फ किम के फूफा नहीं थे, बल्कि उन्हें उत्तर कोरिया का दूसरा सबसे ताकतवर शख्स माना जाता था। वे सालों से किम जोंग इल के मुख्य सलाहकार रहे थे और पड़ोसी मुल्क चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बेहद करीबी थे।
दुनिया भर के खुफिया जानकारों और पश्चिमी मीडिया का मानना था कि जवान किम जोंग उन तो सिर्फ एक मुखौटा है, पर्दे के पीछे से असली सरकार और फैसले तो जांग सोंग-थेक ही ले रहे हैं। यही बात किम जोंग उन के भारी ईगो पर चोट कर रही थी। उसे अपना कद छोटा बर्दाश्त नहीं था।
दिसंबर 2013 की वह सर्द सुबह पूरी दुनिया को हिला देने वाली थी। किम ने सरकारी टीवी पर लाइव ब्रॉडकास्ट के दौरान एक अभूतपूर्व कदम उठाया। कम्युनिस्ट पार्टी की एक भरी मीटिंग चल रही थी, तभी हथियारबंद सैनिक अंदर घुसे। उन्होंने किम के ही सगे फूफा जांग सोंग-थेक को उनके पद से उठाया और सरेआम घसीटते हुए बाहर ले गए।
उन पर देशद्रोह, भ्रष्टाचार, अय्याशी और 'चीन का खुफिया एजेंट' होने का भयानक आरोप लगाया गया था। उनकी मौत को लेकर जो कहानियां सामने आईं, उन्होंने पूरी दुनिया के रोंगटे खड़े कर दिए। कुछ दक्षिण कोरियाई खुफिया रिपोर्ट्स ने दावा किया कि उन्हें और उनके सहयोगियों को 120 भूखे शिकारी कुत्तों के एक बाड़े में जिंदा फेंक दिया गया था।
कहा गया कि कुत्तों ने उन्हें नोच-नोच कर खा लिया। हालांकि, बाद में सैटेलाइट तस्वीरों और अन्य विश्वसनीय सूत्रों से यह बात सामने आई कि उन्हें कुत्तों के आगे नहीं डाला गया था, बल्कि एक सैन्य फायरिंग रेंज में ले जाकर एंटी-एयरक्राफ्ट गन (विमानभेदी तोप) से सरेआम गोलियों से भून दिया गया था। उनके शरीर के चीथड़े उड़ गए थे।
इस हत्याकांड के बाद उन्हें गद्दार घोषित करते हुए किताबों, तस्वीरों और सरकारी दस्तावेजों से उनका चेहरा फोटोशॉप करके हमेशा के लिए मिटा दिया गया। किम का मकसद एकदम साफ था—पार्टी और सेना को यह संदेश देना कि "अगर मैं सत्ता के लिए अपने सगे फूफा को इस बेहरमी से मार सकता हूं, तो तुममें से कोई भी मेरी नजरों से सुरक्षित नहीं है।"
कुआलालंपुर एयरपोर्ट: एक हाई-प्रोफाइल मर्डर जो हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं था
सगे फूफा को रास्ते से हटाने के बाद भी किम जोंग उन का पैरानोइया (मानसिक डर) खत्म नहीं हुआ था। उसे अब भी अपने सिंहासन पर एक बड़ा खतरा मंडराता हुआ दिख रहा था। यह खतरा कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना ही बड़ा सौतेला भाई, किम जोंग-नाम (Kim Jong-nam) था।
किम जोंग-नाम काफी समय से देश से बाहर मकाऊ और चीन में एक निर्वासित जीवन जी रहे थे। वे खुले विचारों के थे और कई बार इंटरनेशनल मीडिया में अपने भाई की तानाशाही की दबी जुबान में आलोचना भी कर चुके थे। सबसे बड़ी बात, किम जोंग उन को शक था कि उसका भाई अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA का मुखबिर बन चुका है और अमेरिका उसे सत्ता से हटाकर नाम को गद्दी पर बिठाना चाहता है।
13 फरवरी 2017 का दिन था। मलेशिया का भीड़भाड़ वाला कुआलालंपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट (KLIA)। किम जोंग-नाम अपनी एक फ्लाइट पकड़ने के लिए चेक-इन काउंटर की तरफ जा रहे थे। जो कुछ अगले चंद मिनटों में वहां हुआ, वो किसी जेम्स बॉन्ड या नेटफ्लिक्स के स्पाई थ्रिलर से कम नहीं था।
सीसीटीवी फुटेज में दिखा कि अचानक दो युवा महिलाएं (एक वियतनामी और एक इंडोनेशियाई) पीछे से नाम के पास आईं। एक ने उनके चेहरे पर पीछे से हाथ रखा और कुछ ही सेकंड में दोनों लड़कियां वहां से भाग गईं। देखने में यह किसी यूट्यूब प्रैंक जैसा लग रहा था। नाम घबराए हुए एयरपोर्ट सिक्योरिटी के पास गए और कहा कि किसी ने उनके चेहरे पर एक चिपचिपी क्रीम लगा दी है।
वो क्रीम कोई साधारण लोशन नहीं थी। वह दुनिया का सबसे खतरनाक और प्रतिबंधित केमिकल वेपन—नर्व एजेंट 'VX' था। यह साइनाइड से भी 100 गुना ज्यादा घातक होता है। इसकी एक बूंद ही इंसान के नर्वस सिस्टम को चोक करने के लिए काफी है।
महज 20 मिनट के अंदर, अस्पताल ले जाते वक्त किम जोंग-नाम के मुंह से झाग निकलने लगा और तड़प-तड़प कर उनकी मौत हो गई। बाद में जांच में पता चला कि उन लड़कियों को उत्तर कोरियाई जासूसों ने यह कहकर हायर किया था कि वे एक टीवी प्रैंक शो की शूटिंग कर रहे हैं। यह पूरी दुनिया और खासकर अमेरिका की CIA को किम जोंग उन का एक सीधा और खौफनाक मैसेज था—"मेरा दुश्मन दुनिया के किसी भी कोने में छिपा हो, मेरा कातिल हाथ उसकी गर्दन तक पहुंच ही जाएगा।"
बारूद की खेती: जब जनता के निवाले से ज्यादा 'एटम बम' की कीमत हो गई
एक तरफ उत्तर कोरिया की आम जनता दो वक्त की सूखी रोटी और मुट्ठी भर चावल के लिए तरस रही है, तो दूसरी तरफ उनका 'सुप्रीम लीडर' किम जोंग उन हर साल अरबों डॉलर बैलिस्टिक मिसाइलों और न्यूक्लियर वेपन्स के परीक्षणों पर फूंक रहा है।
इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थशास्त्र की भाषा में 'Guns vs. Butter' (बंदूक बनाम मक्खन) का क्लासिक डिलेमा (Dilemma) कहा जाता है। एक देश के पास सीमित पैसा है, अब वह या तो अपनी जनता का पेट भरे (मक्खन) या हथियार खरीदे (बंदूक)। किम ने हमेशा बंदूक को चुना है।
इस सनक की जड़ें इतिहास में गहरी हैं। 1990 के दशक में जब सोवियत संघ (USSR) के टुकड़े हुए, तो उत्तर कोरिया को मिलने वाली भारी आर्थिक और कृषि मदद रातों-रात रुक गई। देश का पूरा सिस्टम चरमरा गया। वहां एक भयानक अकाल आया जिसे वे 'आर्डुअस मार्च' (Arduous March) कहते हैं।
इस अकाल में करीब 20 से 30 लाख उत्तर कोरियाई लोग भूख और बीमारियों से तड़प-तड़प कर मर गए। हालात इतने ज्यादा अमानवीय और खराब थे कि लोग जिंदा रहने के लिए पेड़ों की छाल, जंगली घास और यहां तक कि मिट्टी खाने पर मजबूर हो गए थे। कुछ रिपोर्ट्स में तो भूख के कारण इंसान द्वारा इंसान का मांस खाने (Cannibalism) की खौफनाक घटनाएं भी सामने आई थीं।
हाल ही में 2020 में जब कोरोना महामारी आई, तब भी दुनिया वैक्सीन बांट रही थी, लेकिन किम ने अपनी सीमाएं पूरी तरह सील कर दीं। चीन से आने वाली रसद की सप्लाई रुक गई। भुखमरी का वो भयानक दौर फिर से लौट आया, लेकिन तानाशाह किम का ध्यान कहीं और ही था। उसका फोकस सिर्फ अपनी मिसाइलों की रेंज बढ़ाने पर था।
| उत्तर कोरिया का परमाणु टाइमलाइन | मुख्य परीक्षण और दुनिया पर प्रभाव |
|---|---|
| साल 2006 | उत्तर कोरिया का पहला अंडरग्राउंड परमाणु परीक्षण। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने कड़े प्रतिबंध लगाए। |
| साल 2013 | किम जोंग उन के शासन में पहला परीक्षण। यूरेनियम का इस्तेमाल किया गया। |
| सितंबर 2017 (गेम चेंजर) | दुनिया का सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन बम का परीक्षण। इसकी ताकत हिरोशिमा बम से 10 गुना ज्यादा थी। भूकंप के झटके महसूस किए गए। |
| 2022 - 2024 | लगातार ICBM (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) परीक्षण। ये मिसाइलें अमेरिका के किसी भी शहर को पल भर में राख कर सकती हैं। |
परमाणु हथियारों की सनक: आखिर क्यों किम को चाहिए 'एटम बम'?
पश्चिमी मीडिया अक्सर किम जोंग उन को एक 'पागल', 'सनकी' या 'कार्टून कैरेक्टर' के रूप में पेश करती है। लेकिन भू-राजनीति (Geopolitics) के असली जानकार मानते हैं कि किम जोंग उन बेवकूफ बिल्कुल नहीं हैं। वे एक बेहद चतुर और निर्मम रणनीतिकार हैं।
वे बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि मध्य पूर्व के तानाशाहों—लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी और इराक के सद्दाम हुसैन—का क्या खौफनाक हश्र हुआ था। गद्दाफी ने पश्चिमी देशों के वादे पर भरोसा करके अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद कर दिया था। नतीजा? अमेरिका और नाटो सेनाओं ने उस पर हमला कर दिया और गद्दाफी को सड़क पर जानवरों की तरह मारा गया।
किम ने इतिहास से यह कड़वा सबक सीख लिया है। वह जानता है कि अगर उसके पास 'न्यूक्लियर बटन' नहीं होगा, तो अमेरिका उसे एक पल में सत्ता से उखाड़ फेंकेगा। किम के लिए ये हाइड्रोजन और एटम बम सिर्फ हथियार नहीं हैं, बल्कि ये उसकी और उसके पूरे राजवंश की 'लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी' (जीवन बीमा) हैं।
यही वजह थी कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी अपनी सारी 'ईगो' छोड़कर सिंगापुर और हनोई में किम जोंग उन से बराबरी के स्तर पर मिलना पड़ा था। एक ऐसा देश जहां के लोग भूखे मर रहे हैं, उसका तानाशाह अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ हाथ मिला रहा था।
किम जोंग उन ने पूरी दुनिया को यह बात साबित कर दी है कि जिसके हाथ में 'एटम बम' का ट्रिगर है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसकी बात सुनने और उसे बर्दाश्त करने को मजबूर है। वह 'मैडमैन थ्योरी' (Madman Theory) का इस्तेमाल कर रहा है—दुनिया को यह जताना कि वह इतना सनकी है कि किसी भी दिन बटन दबा सकता है, ताकि कोई उस पर हमला करने की जुर्रत न करे।
अंधेरे में कैद जिंदगी: उत्तर कोरिया का असली "1984" रियलिटी
मशहूर ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ओरवेल ने अपने कल्ट उपन्यास "1984" में एक ऐसी डायस्टोपियन (Dystopian) दुनिया का जिक्र किया था जहां सरकार नागरिक की हर गतिविधि, यहां तक कि उसकी सोच (Thought Police) पर भी कड़ा पहरा देती है। वहां का तानाशाह 'बिग ब्रदर' सब कुछ देखता है।
दुनिया के बाकी देशों के लिए यह सिर्फ एक डरावनी कल्पना या साइंस फिक्शन किताब है। लेकिन उत्तर कोरिया के ढाई करोड़ नागरिकों के लिए यह एक खौफनाक, कड़वा और रोजाना का सच है। वहां का हर नागरिक पैदा होने से लेकर मरने तक सरकार की माइक्रो-मैनेजमेंट वाली नजर में रहता है।
वहां इंसानों को नागरिक नहीं, बल्कि एक सरकारी मशीन का पुर्जा माना जाता है। वहां एक 'सोंगबुन' (Songbun) नाम का सामाजिक जाति सिस्टम है, जो यह तय करता है कि कौन सरकार के प्रति कितना वफादार है। आपकी वफादारी के हिसाब से ही आपको खाना, नौकरी और घर मिलता है। आइए नजर डालते हैं वहां के कुछ रूह कंपा देने वाले कानूनों पर।
- इंटरनेट पर सख्त 'ताला': वहां आप फेसबुक, गूगल या यूट्यूब नहीं खोल सकते। देश में 'Kwangmyong' नाम का एक बंद सरकारी नेटवर्क चलता है। आपको इंटरनेट कैफे जाने के लिए इजाजत लेनी होती है, और पुलिस पीछे खड़ी होकर देखती है कि आप क्या पढ़ रहे हैं।
- फैशन पुलिस का डंडा: वहां ब्लू जींस पहनना सख्त मना है क्योंकि इसे 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' का गंदा प्रतीक माना जाता है। महिलाएं रंगीन कपड़े नहीं पहन सकतीं।
- हेयरकट का भी मेनु: आप अपनी मर्जी से बाल नहीं कटवा सकते। सरकार ने सैलून में 15 से 28 हेयर स्टाइल का एक पोस्टर लगा रखा है। आपको उसी में से एक स्टाइल चुनना होता है। युवाओं को किम जोंग उन जैसा हेयरकट रखने का दबाव डाला जाता है।
- मनोरंजन मौत की दावत है: देश में केवल 3-4 सरकारी टीवी चैनल हैं जिन पर दिन-रात किम राजवंश की तारीफ के गीत बजते हैं। अगर कोई चीनी पेन ड्राइव में स्मगल की गई साउथ कोरियन फिल्म (K-Drama) या हॉलीवुड मूवी देखते पकड़ा गया, तो उसे सरेआम फायरिंग स्क्वाड के सामने खड़ा करके गोली मार दी जाती है।
द थ्री जनरेशन रूल: एक की गलती, तीन पीढ़ियों को सजा
तानाशाही के सारे कानूनों में से जो कानून सबसे ज्यादा खौफ पैदा करता है, वह है उत्तर कोरिया का 'Three Generations Punishment' (तीन पीढ़ियों की सजा) का क्रूर नियम। यह नियम इंसान की आत्मा को कुचलने के लिए बनाया गया है।
कल्पना कीजिए, अगर आप उत्तर कोरिया में रहते हैं और गलती से आपने शराब के नशे में किम जोंग उन की किसी तस्वीर पर उंगली रख दी, या अखबार में छपी उनकी फोटो को मोड़ दिया, तो यह ईशनिंदा (Blasphemy) मानी जाएगी। आपको रातों-रात सीक्रेट पुलिस उठा ले जाएगी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सजा सिर्फ आपको नहीं मिलेगी। इस कानून के तहत, आपकी गलती की सजा आपके बूढ़े माता-पिता (पहली पीढ़ी), आपको (दूसरी पीढ़ी) और आपके मासूम बच्चों (तीसरी पीढ़ी) को भी भुगतनी होगी। पूरे खानदान को जानवरों की तरह मालगाड़ी में भरकर योडोक (Yodok) जैसे खौफनाक राजनीतिक जेल शिविरों (Gulag) में भेज दिया जाएगा।
वहां आपके परिवार को दिन में 14-14 घंटे कोयले की खदानों में काम करना होगा। उन्हें खाने में सिर्फ सड़े हुए मकई के दाने दिए जाएंगे। आपके बच्चों की पूरी जिंदगी उसी कंटीले तारों वाले कैंप में मजदूरी करते हुए कट जाएगी। इस कानून का खौफ इतना गहरा है कि कोई भी नागरिक बगावत करने का ख्याल भी अपने दिमाग में नहीं लाता, क्योंकि उसे अपने से ज्यादा अपने मासूम बच्चों की फिक्र होती है।
अगला वारिस कौन: बहन का तेज दिमाग या बेटी की मासूमियत?
तानाशाही सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि उसमें सत्ता के ट्रांसफर का कोई पारदर्शी तरीका नहीं होता। किम जोंग उन का स्वास्थ्य हमेशा से दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के लिए एक बड़ी चर्चा का विषय रहा है। किम अत्यधिक मोटापे, चेन स्मोकिंग और भारी शराब पीने की लत के शिकार हैं।
साल 2020 में तो एक बार यह अफवाह बहुत मजबूती से उड़ गई थी कि किम जोंग उन की हार्ट सर्जरी के दौरान मौत हो गई है। वह हफ्तों तक गायब रहे थे। ऐसे में ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स का सबसे बड़ा और डरावना सवाल यह उठता है कि अगर किम को कुछ हो गया, तो इस 'परमाणु बटन' का अगला वारिस कौन होगा?
उत्तर कोरिया की सत्ता के इस रहस्यमयी गलियारे में फिलहाल उत्तराधिकार की रेस में दो नाम सबसे आगे चल रहे हैं। दोनों ही महिलाएं हैं, जो इस पुरुष-प्रधान कम्युनिस्ट समाज के लिए एक बहुत बड़ा बदलाव हो सकता है।
| उत्तराधिकार के प्रबल दावेदार | उनकी ताकत और कमजोरी |
|---|---|
| किम यो-जोंग (Kim Yo-jong) - बहन | इन्हें किम का 'दिमाग' माना जाता है। ये बेहद आक्रामक हैं। अमेरिका और साउथ कोरिया को खुलेआम गालियां देती हैं। ताकतवर हैं, लेकिन सीधे वारिस नहीं हैं। |
| किम जू-ऐ (Kim Ju-ae) - बेटी | किम जोंग उन की लगभग 12-13 साल की बेटी। हाल ही में मिसाइल लॉन्च के दौरान पिता का हाथ पकड़े नजर आई। इसे अगली वारिस के तौर पर 'ग्रूम' किया जा रहा है। |
हाल के महीनों में किम जोंग उन ने अपनी युवा बेटी किम जू-ऐ को सैन्य परेडों और बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चिंग साइट्स पर दुनिया के सामने पेश करना शुरू कर दिया है। सेना के बड़े-बड़े जनरल इस छोटी सी बच्ची के सामने झुककर सलाम करते नजर आते हैं। जानकारों का मानना है कि किम अभी से अपनी 'लिटिल प्रिंसेस' की सत्ता के लिए ब्रांडिंग कर रहे हैं।
लेकिन दुनिया के लिए चेहरा बिल्कुल मायने नहीं रखता। वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक, सुरक्षा विशेषज्ञों को सिर्फ एक ही बात की फिक्र है—चाहे गद्दी पर बहन बैठे या बेटी, क्या किम राजवंश की अगली पीढ़ी भी इसी तरह दुनिया को डराकर 'बारूद की खेती' करना जारी रखेगी? या फिर कभी प्योंगयांग में बदलाव की कोई हवा चलेगी?
1. उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया आखिर क्यों अलग हुए?
1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में जापान की हार के बाद, कोरिया को जापानी कब्जे से तो आजादी मिल गई, लेकिन यह देश दो महाशक्तियों के बीच फंस गया। उत्तरी हिस्से पर कम्युनिस्ट रूस की सेनाओं ने कब्जा कर लिया और दक्षिणी हिस्से पर अमेरिका का नियंत्रण हो गया। 1948 में इन वैचारिक मतभेदों (कम्युनिज्म बनाम कैपिटलिज्म) को सुलझाने के बजाय, नक्शे पर '38th Parallel' नाम की एक रेखा खींचकर एक ही देश को हमेशा के लिए दो अलग-अलग मुल्कों में फाड़ दिया गया।
2. किम जोंग उन अपनी भूखी जनता के पैसे परमाणु हथियारों पर क्यों फूंक रहे हैं?
किम जोंग उन परमाणु बमों को अपने जीवन और सत्ता की 'एकमात्र गारंटी' मानते हैं। इतिहास में इराक के सद्दाम हुसैन और लीबिया के गद्दाफी का हश्र देखकर किम को यह बात समझ आ गई है कि बिना न्यूक्लियर पावर के पश्चिमी देश उन्हें कभी भी उखाड़ फेंकेंगे। उनका मानना है कि जब तक उनके पास अमेरिका को तबाह करने वाली मिसाइलें हैं, कोई भी देश उत्तर कोरिया पर सैन्य हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा। यह उनके लिए एक आक्रामक 'सुरक्षा कवच' है।
3. क्या उत्तर कोरियाई आम नागरिक देश छोड़कर कहीं बाहर भाग सकते हैं?
बिल्कुल नहीं। उत्तर कोरिया से बिना सरकारी इजाजत के सीमा पार करना सीधे-सीधे मौत को दावत देना है। चीन और दक्षिण कोरिया से सटी सीमाओं पर हाई-वोल्टेज करंट वाले तार, लैंडमाइंस और स्नाइपर तैनात रहते हैं। जो लोग भागने की कोशिश करते हैं और पकड़े जाते हैं, उन्हें वहीं गोली मार दी जाती है। अगर कोई भागने में सफल भी हो जाए, तो उसके पीछे बचे हुए पूरे परिवार (माता-पिता, पत्नी, बच्चों) को पकड़कर लेबर कैंप में कठोर सजा भुगतने के लिए डाल दिया जाता है।
4. किम जोंग उन को इतनी क्रूर तानाशाही की शिक्षा कहां मिली थी?
यह बात काफी हैरान करने वाली है कि किम जोंग उन ने अपनी शुरुआती शिक्षा किसी बंद कम्युनिस्ट स्कूल में नहीं, बल्कि यूरोप के स्विट्जरलैंड (बर्न शहर) में पूरी की थी। वहां वे 1990 के दशक में 'पाक उन' के फर्जी नाम से पढ़ते थे। स्कूल में वे एक शर्मीले, बास्केटबॉल प्रेमी और हॉलीवुड फिल्में देखने वाले आम बच्चे के रूप में जाने जाते थे। लेकिन सत्ता मिलते ही उन्होंने पश्चिमी संस्कृति को त्याग दिया और अपने दादा की तरह क्रूर तानाशाही का रास्ता अपना लिया।
5. अगर किम जोंग उन को कुछ हो गया, तो उत्तर कोरिया का भविष्य क्या होगा?
किम के भारी मोटापे और सिगरेट की लत के कारण उनके खराब स्वास्थ्य की खबरें आती रहती हैं। फिलहाल उनकी तेज-तर्रार बहन 'किम यो-जोंग' और उनकी 12-13 साल की बेटी 'किम जू-ऐ' को सत्ता का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। किम अपनी बेटी को सार्वजनिक मंचों पर लाकर अभी से तैयार (Groom) कर रहे हैं। हालांकि, उत्तर कोरिया जैसी तानाशाही और पुरुष-प्रधान व्यवस्था में उत्तराधिकार हमेशा सैन्य तख्तापलट और खूनी संघर्ष की अनिश्चितताओं से भरा होता है।