क्रिकेट के मैदान पर भारत और पाकिस्तान की जंग हमेशा से ही हाई-वोल्टेज रही है, लेकिन टी20 वर्ल्ड कप 2026 के बीच जो 'शतरंज की चालें' प्रशासनिक गलियारों में चली जा रही हैं, उन्होंने खेल को पीछे छोड़ दिया है। हैरानी की बात यह है कि यह गतिरोध तब हो रहा है जब वर्ल्ड कप का रोमांच अपने चरम पर है—जहाँ भारत ने अमेरिका को मात दी है और पाकिस्तान ने नीदरलैंड के खिलाफ हारते-हारते अपनी लाज बचाई है। लेकिन असली घमासान 15 फरवरी को कोलंबो में होने वाले महामुकाबले को लेकर है। पाकिस्तान के 'बॉयकाट' के शोर और आईसीसी (ICC) की कड़ी कार्रवाई के बीच, एक वरिष्ठ खेल पत्रकार के रूप में मैं आपके सामने वे सच रख रहा हूँ जो बोर्ड रूम की चारदीवारी में दफन थे।
1. दिवालियापन का डर या कूटनीतिक हार? क्यों मुकरने को मजबूर है PCB
क्रिकेट के गलियारों से मिल रही पुख्ता जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान अपने बॉयकाट के रुख से 99% 'यू-टर्न' लेने की तैयारी में है। सिद्धांतों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाला पीसीबी (PCB) अब वित्तीय दिवालियापन के डर से सहमा हुआ है। आईसीसी ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान मैच से पीछे हटता है, तो उसे न केवल भारी जुर्माना भरना होगा, बल्कि भविष्य के आयोजनों से भी हाथ धोना पड़ सकता है।
इस पूरे ड्रामे पर पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली ने जो वार किया है, वह पाकिस्तान की तर्कहीनता को बेनकाब करता है:
"वर्ल्ड कप से बाहर होना समझ से परे है। वे वैसे भी श्रीलंका में खेल रहे हैं (नीदरलैंड के खिलाफ मैच खेल चुके हैं)। पाकिस्तान के पीछे हटने की खबरों से मैं हैरान हूँ। वर्ल्ड कप में हर एक अंक महत्वपूर्ण होता है और इस तरह का कदम आत्मघाती है।"
2. बांग्लादेश—पाकिस्तान का 'एशियाई ब्लॉक' और रणनीतिक हथियार
इस पूरे विवाद में पाकिस्तान ने बांग्लादेश को अपनी 'ढाल' बनाने की कोशिश की है। बीसीबी (BCB) प्रमुख अमीनुल इस्लाम बुलबुल का लाहौर पहुंचना महज इत्तेफाक नहीं है। पीसीबी ने आईसीसी के सामने तीन चौंकाने वाली माँगें रखी हैं:
- टूर्नामेंट से बाहर हो चुके बांग्लादेश के लिए भागीदारी शुल्क (Participation fee)।
- बांग्लादेश के लिए बुनियादी ढांचे और विकास के नाम पर अतिरिक्त मुआवजा।
- भविष्य के आईसीसी आयोजनों की मेजबानी का लिखित आश्वासन।
रणनीतिक विश्लेषण: पाकिस्तान यहाँ बांग्लादेश की आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा उठाकर आईसीसी के भीतर एक 'एशियाई ब्लॉक' खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। यह 'बिग थ्री' (विशेषकर भारत) के प्रभाव को चुनौती देने और अन्य एशियाई देशों को अपनी ओर खींचने की एक गहरी कूटनीतिक चाल है।
3. पीसीबी का आंतरिक गृहयुद्ध और 9 बोर्ड अधिकारियों का विरोधाभास
बोर्ड के भीतर प्रशासनिक गतिरोध इस कदर बढ़ गया है कि अध्यक्ष मोहसिन नकवी अलग-थलग पड़ते दिख रहे हैं। जहाँ बोर्ड के कई वरिष्ठ अधिकारी वित्तीय नुकसान को देखते हुए भारत के खिलाफ खेलने के पक्ष में हैं, वहीं नकवी घरेलू जनता को खुश करने के लिए 'हार्डलाइनर' की छवि बनाए हुए हैं।
सबसे बड़ा मोड़ सोमवार, 9 फरवरी को आने वाला है। मैच से महज छह दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ होने वाली यह दूसरी बड़ी बैठक तय करेगी कि पाकिस्तान खेल की भावना को चुनेगा या राजनीतिक जिद को। नकवी का अड़ियल रवैया दरअसल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की एक कोशिश मात्र है।
4. 'फोर्स मेज्योर' दांव का विफल होना: सोशल मीडिया बना कानूनी मजाक
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय खेल कानूनों में मौजूद 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) क्लॉज का सहारा लेकर मैच रद्द करने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि 1 फरवरी को उनकी सरकार द्वारा जारी एक 'सोशल मीडिया पोस्ट' के निर्देश के कारण वे खेलने में असमर्थ हैं।
विश्लेषण: अंतरराष्ट्रीय स्पोर्ट्स लॉ के इतिहास में शायद ही कभी किसी सोशल मीडिया पोस्ट को 'अनिवार्य कारण' मानकर अनुबंध तोड़ा गया हो। यही वजह है कि आईसीसी ने इसे "बिना किसी औचित्य या आधार" का बताकर सिरे से खारिज कर दिया। यह दिखाता है कि पाकिस्तान का कानूनी पक्ष कितना कमजोर और बचकाना था।
5. श्रीलंका की ऐतिहासिक अपील और एहसानों का हिसाब
इस विवाद में श्रीलंका क्रिकेट (SLC) ने एक भावुक लेकिन रणनीतिक हस्तक्षेप किया है। पीसीबी को लिखे पत्र में श्रीलंका ने 2009 के लाहौर आतंकी हमलों के काले दिनों की याद दिलाई है। श्रीलंका ने याद दिलाया कि जब दुनिया ने पाकिस्तान का बहिष्कार किया था, तब श्रीलंका ने ही वहां का दौरा कर क्रिकेट की बहाली की थी। अब श्रीलंका वही 'एहसान' वापस मांग रहा है ताकि कोलंबो में होने वाले मैच से उन्हें जो आर्थिक लाभ होना है, वह बॉयकाट की भेंट न चढ़ जाए। खेल कूटनीति में यह 'ऐतिहासिक कर्ज' पाकिस्तान पर भारी पड़ रहा है।
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निष्कर्ष: जय शाह बनाम मोहसिन नकवी—अंतिम जंग
मौजूदा हालात को देखते हुए टकराव का रास्ता केवल तबाही की ओर जाता है। जैसा कि पूर्व आईसीसी प्रमुख अहसान मनी ने संकेत दिया है, दूतों के जरिए संदेश भेजने का समय खत्म हो चुका है। अब सीधा समाधान तभी संभव है जब वर्तमान आईसीसी चेयरमैन जय शाह और पीसीबी प्रमुख मोहसिन नकवी आमने-सामने बैठकर बात करें।
अंतिम विचार: क्या 15 फरवरी को कोलंबो में गेंद फेंकी जाएगी, या क्रिकेट की यह कूटनीति खेल की भावना पर स्थायी दाग लगा देगी? क्रिकेट जगत की नजरें अब उस एक हाथ मिलाने या एक अंतिम इनकार पर टिकी हैं जो इस खेल का भविष्य तय करेगा।

